बाल-ए-जिबरील

[Bal-e-Jibreel][bleft]

बांग-ए-दरा

[Bang-e-Dra][bleft]

ज़र्ब-ए-कलीम

[Zarb-e-Kaleem][bleft]

How to Understand Kalam-e-Iqbal | कलाम-ए-इक़बाल को कैसे समझा जाए


एक बार 1925 ई. में प्रोफ़ेसर यूसुफ़ सलीम चिश्ती (अल्लामा के कलाम की सबसे अच्छी व्याख्या करने वाले विद्वान) ने अल्लामा इक़बाल से दबी हुई ज़ुबान में कहा कि 'असरार-इ-ख़ुदी' और 'पयाम-ए-मशरिक़'--दोनों किताबें समझ में नहीं आतीं लेकिन उनको नज़रअंदाज़ भी नहीं कर सकता। उन दोनों किताबों के सिवा कुछ है ही नहीं ! दिमाग़ और अक़्ल ज़रूर इस क़ाबिल नहीं लेकिन दिल हमेशा उनकी तरफ़ खिंचा जाता है।
यह सुनकर अल्लामा इक़बाल ने चिश्ती साहब से पूछा कि आपने 'असरार-ए-ख़ुदी' कितनी बार पढ़ी है?
जवाब मिला, 'पूरी किताब तो नहीं पढ़ी, बस पहला बाब (खण्ड) पढ़ा है, वो ही समझ में नहीं आया ! इसलिए आगे पढ़ने की हिम्मत ही न हुई...........।
यह सुनकर अल्लामा ने फ़रमाया, 'सुलेख और संगीत एक ही दिन में नहीं सीखा जा सकता तो फिर दार्शनिक और तात्विक नज़्में भला एक बार पढ़ने से कैसे समझ में आ जाएँगी ! अल-फ़राबी ने अरस्तू की 'पोस्टीरियर एनालिटिक्स' को कई साल तक निरन्तर पढ़ा था, इसलिए आप भी इस पर अमल करिए और असरार-ओ-पयाम को बार-बार पढ़िए।
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