बाल-ए-जिबरील

[Bal-e-Jibreel][bleft]

बांग-ए-दरा

[Bang-e-Dra][bleft]

ज़र्ब-ए-कलीम

[Zarb-e-Kaleem][bleft]

Farman-e-Khuda (Farishton Se) | फ़रमान-ए-ख़ुदा (फरिश्तों से)


उट्ठो ! मेरी दुनिया के ग़रीबों को जगा दो
काख़-ए-उम'रा के दर-ओ-दीवार हिला दो          ।1।

गरमाओ ग़ुलामों का लहू सोज़-ए-यक़ीं से
कुन्जिश्के फ़िरोमाया को शाहीं से लड़ा दो          ।2।

सुल्तानी-ए-जम्हूर का आता है ज़माना
जो नक़्श-ए-कुहन तुमको नज़र आए, मिटा दो          ।3।

जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नही रोज़ी
उस खेत के हर ख़ोशा-ए-गन्दुम को जला दो          ।4।

क्यूँ ख़ालिक़-ओ-मख़लूक़ में हाइल रहें परदे
पीरान-ए-कलीसा को कलीसा से उठा दो          ।5।

हक़ रा ब-सजूदे, सनमाँ रा ब-तवाफ़े
बहतर है चराग़-ए-हरम-ओ-दैर बुझा दो!          ।6।

मैं ना-ख़ुश-ओ-बेज़ार हूँ मर-मर की सिलों से
मेरे लिए मिटटी का हरम और बना दो!          ।7।

तहज़ीब-ए-नवी कारगहे शीशा गराँ है
आदाब-ए-जुनूँ शायर-ए-मशरिक़ को सिखा दो          ।8।
__________

व्याख्या:

लेनिन (ख़ुदा के हुज़ूर में) और फ़रिश्तों का गीत के बाद अल्लामा की यह तीसरी रचना है जो पूँजीवाद की विभीषिका को बयान करती है। इन तीनों कलाम को इसी क्रम में पढ़ा जाना चाहिए। ईश्वर से लेनिन की वार्ता के बाद फ़रिश्तों ने भी ख़ुदा से मज़दूर, ग़रीबों और किसानों की हिमायत की। पूरे मामले को सुनकर ख़ुदा ने अपने फ़रिश्तों को जो आदेश दिया उस आदेश को अल्लामा इक़बाल ने इस रचना में काव्यबद्ध किया है। इस रचना में आठ शेर हैं जिनकी व्याख्या इस प्रकार है:

उट्ठो ! मेरी दुनिया के ग़रीबों को जगा दो
काख़-ए-उम'रा के दर-ओ-दीवार हिला दो          ।1।

ख़ुदा फ़रिश्तों को आदेश देता है कि दुनिया में जाकर ग़रीबों को जागृत कर दो ताकि उनके भीतर ज़ुल्म, सितम और शोषण के विरुद्ध लड़ने की ताक़त आ जाए। उनके बाज़ुओं में इतनी ताक़त भर दो की अमीरों के बड़े-बड़े महलों की नींव हिल जाए अर्थात शोषण और उत्पीड़न की आधारशिला पर बने हुए ये महल चकनाचूर हो जाएँ।
__________
काख़: महल उम'रा: अमीर का बहुवचन, मालदार, दौलतमन्द, धनी दर: दरवाज़ा, द्वार 
_________________________________________

गरमाओ ग़ुलामों का लहू सोज़-ए-यक़ीं से
कुन्जिश्के फ़िरोमाया को शाहीं से लड़ा दो          ।2।

 

ग़ुलामों के ख़ून में विश्वास और उम्मीद की ज्वाला जला दो ताकि उसकी गरमाहट और ऊर्जा से उनकी शक्तिहीन और नाज़ुक भुजाओं में वो शक्ति आ जाए जिससे कि वो पूंजीवादी शोषकों से भिड़ सकें और अपना हक़ छीन सकें। उम्मीद की किरण एक छोटी गोरैया को वो शक्ति प्रदान करती है कि वह गिद्ध जैसे शक्तिशाली परिंदों से भी नहीं डरती।
__________
लहू: ख़ून  सोज़-ए-यक़ीं: विश्वास की ज्वाला (सोज़-ज्वाला) कुन्जिश्क: चिड़िया, नाज़ुक अथवा कमज़ोर परिन्दा (Sparrow, Bird),  फ़िरोमाया: कम होसले वाला, भीर (Coward) शाहीं: एक शक्तिशाली परिंदा, (Falcon)  
_________________________________________
  
सुल्तानी-ए-जम्हूर का आता है ज़माना
जो नक़्श-ए-कुहन तुमको नज़र आए, मिटा दो          ।3।

 

ज़मीन में दबे-कुचले और शोषित आम आदमी की सल्तनत क़ायम कर दो।  तानाशाही, बर्बरता और ज़ुल्म की हदों को पार करने वाली पुरानी परम्पराओं के सब निशान मिटा दो और यदि कहीं इस प्रकार का कोई शासक अथवा सत्ता तुमको नज़र आ जाये तो तुरंत उसका तख़्ता पलट कर दो, उसका नामो निशान मिटा दो। 
__________
सुल्तानी-ए-जम्हूर: आम आदमी का राज्य (Kingdom of Common Man) नक़्श: छाप, चिह्न कुहन: पुराना, प्राचीन, भूतकालिक 
_________________________________________
 
जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नही रोज़ी
उस खेत के हर ख़ोशा-ए-गन्दुम को जला दो          ।4।

 

यदि कोई किसान अपना ख़ून देकर ज़मीन को सींचता है और महनत के बल पर अनाज की फसल पैदा करता है फिर भी उसको दो वक़्त की रोटी नहीं मिल पाती। सारा उत्पाद और अनाज जमाखोरों, पूंजीपतियों और भ्रष्टों के क़ब्ज़े में चला जाता है। ऐसे उत्पादन का क्या फ़ायदा। मेरा हुक्म है कि उस फसल में उगने वाली अनाज की हर बाली को जला डालो क्यूंकि जब ये अनाज ग़रीब किसान का पेट नही पाल सकता तो फिर किसी और का भी इसपर कोई हक़ नही। 
__________
दहक़ाँ: किसान मयस्सर: उपलब्ध (Available) रोज़ी: भोजन की दैनिक ख़ुराक (Daily Bread) ख़ोशा-ए-गन्दुम: गेहूँ की बाली (Spike of Wheat)
_________________________________________ 

क्यूँ ख़ालिक़-ओ-मख़लूक़ में हाइल रहें परदे
पीरान-ए-कलीसा को कलीसा से उठा दो          ।5।

 

मज़हब के झूठे पेशवा जो मज़हब के ठेकेदार बने फिरते हैं, ये अल्लाह और उसके बन्दों के बीच अवरोध का काम करते हैं। इनकी वजह से बन्दा अपने रब से सीधा सम्पर्क नहीं कर पाता और इनके आडंबरों में फँस कर रह जाता है। ये लोग धर्म पर अपना एकाधिकार (Monopoly) बनाए रखते हैं जिसकी वजह से सामान्य जन वास्तविकता से दूर रहते हैं और धर्म को समझ नहीं पाते हैं। तुमको आदेश दिया जाता है कि ऐसे झूठे ठेकेदारों को इबादतगाहों  से हटा दो।
__________
ख़ालिक़: सृष्टा अर्थात ईश्वर (Creator) मख़लूक़: सृष्टि, ईश्वर की पैदा की गयी चीज़ें जैसे मनुष्य हाइल: बीच में आना, अवरोध, आड़ पीरान-ए-कलीसा: पुजारी, पादरी कलीसा: इबादतगाह, चर्च 
_________________________________________

हक़ रा ब-सजूदे, सनमाँ रा ब-तवाफ़े
बहतर है चराग़-ए-हरम-ओ-दैर बुझा दो!          ।6।
 

ये धर्म के झूठे पेशवा रियाकारी (इबादत के नाम पर दिखावा) करते हैं, मुल्ला मेरे लिए झूठे सजदे करता है और पंडित मूर्ती के इर्द-गिर्द परिभ्रमण करके मेरे प्रति अपना झूठा प्यार दर्शाता है।  हक़ीक़त में ये लोग माया, प्रभुत्व और धन के पुजारी हैं। मेरा आदेश है कि मंदिर और मस्जिदों में इस दिखावे के धंधे को ख़त्म कर दो और हर उस दीपक को बुझा दो जिससे इस धंधे को ऊर्जा मिलती है। 
इस शेर में इक़बाल धर्म के नाम पर दिखावा करने के विरुद्ध हैं। कई बार ये मान लिया जाता है कि इस शेर में इक़बाल धर्म के विरुद्ध हो गए हैं।  ऐसा मानना एक ग़लत व्याख्या है। 
________
हक़: अल्लाह, ईश्वर रा: को  सजूद: सजदे का बहुवचन सनम: बुत, मूर्ती तवाफ़: परिभ्रमण करना, इर्द-गिर्द चक्कर लगाना हरम: मस्जिद, काबा दैर: मंदिर 
_________________________________________ 

मैं ना-ख़ुश-ओ-बेज़ार हूँ मर-मर की सिलों से
मेरे लिए मिटटी का हरम और बना दो!          ।7।

 

संग मर्मर तथा अन्य बहुमूल्य पत्थरों से बने हुए इबादतगाह मेरे लिए किसी काम के नहीं। मुझे इनसे कोई ख़ुशी नहीं मिलती क्यूंकि ये तो ठेकेदारों द्वारा व्यापार के अड्डे बना दिए गए हैं। यहाँ इबादत के नाम पर दिखावा होता है। इबादत और पूजा में ख़ुलूस (आत्मीय शुद्धता) का अभाव है। इनके बदले मिटटी का कोई काबा बना दो जिसका निर्माण पूर्ण आत्मीय शुद्धता से किया गया हो और धन, दौलत, वर्चस्व, प्रभुत्व अथवा माया की कोई छाया न पड़ी हो। 
__________
ना-ख़ुश: अप्रसन्न, नाराज़ बेज़ार: परवाह न करना मर-मर की सिल: संग मर-मर की शिला
_________________________________________ 
 
तहज़ीब-ए-नवी कारगहे शीशा गराँ है
आदाब-ए-जुनूँ शायर-ए-मशरिक़ को सिखा दो          ।8।  


पूँजीवाद और भौतिकवाद ने जिस नई विश्व व्यवस्था को जन्म दिया है, वह कांच की भाँति है जो देखने में बहुत ख़ूबसूरत नज़र आती है किन्तु हक़ीक़त में कमज़ोर बर्तनों की दूकान है।  मेरा हुक्म है कि शायर-ए-मशरिक़ अल्लामा इक़बाल में उन्मत्तता और दीवानापन भर दो ताकि वो इस दुकान में घुसकर इसे नष्ट कर डाले और इस मरीचिका की असलियत दुनिया के सामने ज़ाहिर कर दे।
__________
तहज़ीब-ए-नवी: नयी विश्व व्यवस्था (New World Order) कारगह: कारख़ाना शीशा गराँ: काँच का बना हुआ आदाब-ए-जुनूँ: पागलपन, उन्मत्तता शायर-ए-मशरिक़: पूर्व का कवि, अल्लामा इक़बाल की उपाधि (Poet of the East)
_________________________________________