बाल-ए-जिबरील

[Bal-e-Jibreel][bleft]

बांग-ए-दरा

[Bang-e-Dra][bleft]

ज़र्ब-ए-कलीम

[Zarb-e-Kaleem][bleft]

Introduction to Bal-e-Jibreel | पुस्तक परिचय: बाल-ए-जिबरील


अल्लामा इक़बाल (9 नवंबर 1877- 21 अप्रैल 1938) का व्यक्तित्व किसी परिचय का मोहताज नहीं। मिर्ज़ा असदुल्लाह खान 'ग़ालिब' के बाद उर्दू शायरी में प्राण प्रवाहित करने वाले इस महान विचारक को दुनिया "शायर-ए-मशरिक़ (Poet of the East) के नाम से भी जानती है। इक़बाल उर्दू के साथ-साथ फ़ारसी में अद्भुत दक्षता रखते थे। उनके चार काव्य संग्रह उर्दू भाषा में आये जो इस प्रकार हैं:
  1. बांग-ए-दरा (The Call of the Marching Bell)
  2. बाल-ए-जिबरील (Wings of Gabriel)
  3. ज़र्ब-ए-कलीम (The Rod of Moses)
  4. अरमग़ान-ए-हिजाज़ (The Gift of Hijaz)
बाल-ए-जिबरील अल्लामा इक़बाल के देहान्त से तीन वर्ष पूर्व 1935 में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक की अब तक लगभग चालीस हज़ार (40,000) प्रतियाँ भारतीय उपमहाद्वीप में मुद्रित हो चुकी हैं। इक़बाल की यह रचना कई मायनों में विशेष है। इसमें शायरी अथवा उर्दू-काव्य विधाओं का उच्चस्तरीय प्रयोग किया गया है, यद्यपि दर्शन (Philosophy) दूसरी काव्य संग्रहों की अपेक्षा कम है।

इस पुस्तक के दो भाग हैं। पहले भाग के आरम्भ में ग़ज़लें हैं जिनमे से पहली पांच ग़ज़लों में अल्लामा इक़बाल ने अपने परम प्रियतम (माशूक़-इ-हक़ीक़ी) अर्थात ईश्वर से सम्बोधन किया है। इसके बाद एक नज़्म है जो वस्तुत: एक शिकवा है।  यह शिकवा इक़बाल ने ईश्वर से किया है। विदित रहे कि यह शिकवा इक़बाल के मशहूर 'शिकवा-जवाब शिकवा' से अलग है। 'शिकवा' एवं 'जवाब शिकवा' इक़बाल के दूसरे संग्रह बांग-ए-दरा का हिस्सा हैं।  जबकि बाल-ए-जिबरील में यह 16वीं नज़्म है जिसकी शुरुआत इस प्रकार है:

या रब ! यह जहान-ए-गुज़राँ ख़ूब है लेकिन
क्यूँ ख़्वार हैं मर्दान-ए-सफ़ा कैश-ओ-हुनरमन्द 

इस शिकवे के बाद एक उच्चकोटि की नज़्म है। उसके बाद इकसठ (61) ग़ज़लें हैं। उनके बाद बाईस (22) रुबाई हैं। दूसरे हिस्से में नज़्में हैं जिनमें सबसे महत्वपूर्ण "साक़ीनामा" है।  साक़ीनामा जैसी रचनायें उर्दू अदब का अलंकार होती हैं और इस प्रकार की रचनाएँ कम ही देखनें को मिलती हैं।
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