बाल-ए-जिबरील

[Bal-e-Jibreel][bleft]

बांग-ए-दरा

[Bang-e-Dra][bleft]

ज़र्ब-ए-कलीम

[Zarb-e-Kaleem][bleft]

Intorduction: Bang-e-Dara | पुस्तक परिचय: बांग-ए-दरा


बांग-ए-दरा (बांग: आवाज़, दरा: काफ़ले की रुख़सती के वक़्त बजने वाली घण्टी) (Call of the Marching Bell) अल्लामा इक़बाल का पहला उर्दू काव्य संग्रह है। बांग-ए-दरा अल्लामा इक़बाल की सबसे ज़्यादा मशहूर पुस्तक है। यह उर्दू ज़ुबान में है। भारतीय उपमहाद्वीप में अल्लामा इक़बाल की प्रचण्ड प्रसिद्धि का कारण यही पुस्तक है। इसकी वजह ये है कि इसकी भाषा उनकी दूसरी पुस्तकों की अपेक्षा कहीं आसान है जो जन सामान्य को सरलता से समझ में आती है। उदाहरणार्थ:
टहनी पे किसी शजर की तन्हा 
बुलबुल था कोई उदास बैठा। (नज़्म- हमदर्दी )

आता है याद मुझको गुज़रा हुआ ज़माना 
वो बाग़ की बहारें वो सब का चहचहाना  (नज़्म- परिन्दे की फ़रयाद)

परवाना तुझ से करता है ऐ शमा प्यार क्यूँ 
यह जान बेक़रार है तुझ पर निसार क्यूँ। (नज़्म- शमा-ओ-परवाना)

बांग-ए-दरा की रचनाओं को तीन भाग में बाँटा जा सकता है:
  1. 1905 तक लिखी गयी रचनायें
  2. 1905-1908 तक लिखे गए कलाम 
  3. 1908-1923 तक लिखे गए कलाम 
अल्लामा की यह किताब 1924 में प्रकाशित हुई। इससे ठीक पहले अल्लामा की तीन किताबें असरार-ए-ख़ुदी, रुमूज़-ए-बेख़ुदी और पयाम-ए-मशरिक़ क्रमश: 1914, 1915, तथा 1923 में आयीं। ये तीनो काव्य संग्रह फ़ारसी भाषा में थे जो काफी कठिन थे। इस लम्बे अंतराल के पश्चात जब बांग-ए-दरा प्रकाशित हुई तो लोगों ने इसे हाथों हाथ लिया।
बांग-ए-दरा की शोहरत का कारण इसमें शामिल वो ग़ज़लें और नज़्में भी हैं जो इसके प्रकाशित होने से पहले समाज में बहुत प्रचलित थी और अक्सर लोगों की ज़ुबान पर रहती थी। जैसे:
कभी ऐ हकीकत-ए-मुन्तज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
क: हज़ारों सजदे तड़प रहे हैं मेरी जबीन-ए-नियाज़ में।
ये मशहूर रचनायें अल्लामा द्वारा विभिन्न सभाओं, जलसों, समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं इत्यादि में सुनाई या लिखी जा चुकी थीं। जैसे बांग-ए-दरा की पहली नज़्म "हिमाला(हिमालय)" पत्रिका मख़ज़न में 1901 में प्रकाशित हो चुकी थी।
बांग-ए-दरा में वो नज़्में और ग़ज़लें भी शामिल हैं जो देशप्रेम तथा राष्ट्रवाद से ओतप्रोत हैं। भारत की प्राकृतिक, सामाजिक, राजनैतिक तथा आध्यात्मिक धरोहर का बेहतरीन ख़ाका अल्लामा इक़बाल में बांग-ए-दरा में खींचा। हिमाला, तस्वीर-ए-दर्द, तराना-ए-हिन्दी, नया शिवाला, राम, स्वामी रामतीर्थ, मिर्ज़ा ग़ालिब जैसी रचनायें अल्लामा ने हुब्बुल वतनी के रंग में डूबकर लिखी हैं।  अपने हमवतन हिन्दुस्तानियों को नसीहत करते हुए अल्लामा ने तस्वीर-ए-दर्द में लिखा:
वतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली है 
तेरी बर्बादियों के मशविरें हैं आसमानों में !
इसी नज़्म में आगे लिखते हैं:
न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्ताँ वालो 
तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों में !
बांग-ए-दरा की शोहरत का एक कारण ये भी है कि इसी पुस्तक में उन रचनाओं को भी शामिल किया गया जो अल्लामा ने 'अंजुमन हिमायत-उल-इस्लाम, लाहौर' के सालाना जलसों में पढ़ी थीं और लोगो के बीच बहुत प्रशंसनीय थीं।
अल्लामा इक़बाल ने बांग-ए-दरा में जो रचनायें शामिल की हैं उनसे साफ़ ज़ाहिर होता है कि इक़बाल पर दूसरे कवियों का भी असर रहा है। इस बात की पुष्टि आगे जाकर बाल-ए-जिबरील में भी हुई जब उन्होंने पूरी किताब की भूमिका में सिर्फ़ एक शेर लिखा जो राजा भर्तृहरि के श्लोक से प्रेरित था। बांग-ए-दरा में अंग्रेज़ी कवियों के विचारों को उर्दू में कलमबद्ध किया गया जैसे 'रुखसत ऐ बज़्मे जहाँ' कवि इमर्सन से प्रेरित है, 'हमदर्दी' काऊपर से। इसके अलावा अल्लामा ने बांग-ए-दरा में उर्दू के दिग्गज कवियों मीर तक़ी मीर और दाग़ देहलवी से प्रेरित रचनाएँ लिखी।  स्वयं को दाग़ का शागिर्द मानते हुए लिखते हैं:
नसीम-ओ-तिशना ही इक़बाल कुछ इस पर नहीं नाज़ाँ 
मुझे भी फ़ख़्र है शागिर्दी दाग़-ए-सुख़नदाँ की।
बांग-ए-दरा की विशेषता ये है कि इसमें हर उम्र के व्यक्ति के लिए शेर कहे गए हैं। बच्चों के लिए अल्लामा ने कई नज़्में बांग-ए-दरा में लिखी जिनमे मकड़ी और मक्खी, एक पहाड़ और गिलहरी, एक गाय और बकरी, बच्चे की दुआ, माँ का ख़्वाब, परिन्दे की फ़रियाद, हिन्दुस्तानी बच्चों का क़ौमी गीत, हमदर्दी इत्यादि शामिल हैं। प्रकृति के सौंदर्य को काव्य में ख़ूबसूरत रूप देने का काम अल्लामा ने कसरत से किया जिसे बांग-ए-दरा में कई नज़्मों में देखा जा सकता है जैसे: अब्र-ए-रंगीन, अब्र-ए-कोहसार, हिमाला, आफ़ताब, माह-ए-नौ, चाँद, सुबह, अख़्तर-ए-सुबह, पयाम-ए-सुबह, जुगनू और शमा इत्यादि।
जिस शुरूआती दौर में बांग-ए-दरा रचना हुई उस वक़्त अल्लामा का वतनपरस्ती का जज़्बा सर चढ़ कर बोलता था।  यहाँ तक कि अपने कलाम में हिंदी और खड़ी बोली के शब्द भी इस्तेमाल किये हैं:
शक्ति भी शांति भी भगतों के गीत में है 
धरती के बासियों की मुक्ति प्रीत में है। 
बांग-ए-दरा  के बाद के हिस्से में इक़बाल की शायरी संजीदा और नसीहत देने वाली हो गयी है। ये नज़्में इक़बाल ने अपने यूरोप दौरे के बाद लिखी थी। 1907 में उन्होंने यूरोप से जो नज़्म "अलीगढ़ कॉलेज के तलबा के नाम" भेजी थी, वास्तव में वह उनका पहला पैग़ाम था जो उन्होंने अपनी क़ौम और उसके नौजवानों को दिया और आगे के तीस साल क़ौम की इसी नसीहत में गुज़ार दिए। 1907 में लिखते हैं:
मैं ज़ुल्मत-ए-शब में ले के निकलूंगा अपने दरमांदा कारवाँ को 
शरर फ़शां होगी आह मेरी नफ़्स मिरा शोला बार होगा।
अपनी क़ौम के प्रति उनके दिल में जो दर्द था वो शिकवा-जवाबे शिकवा के ज़रिये इसी बांग-ए-दरा में सबके सामने आया। अन्तत: दुनिया ने देखा कि इक़बाल ने जो कहा था वो करके दिखाया।
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