बाल-ए-जिबरील

[Bal-e-Jibreel][bleft]

बांग-ए-दरा

[Bang-e-Dra][bleft]

ज़र्ब-ए-कलीम

[Zarb-e-Kaleem][bleft]

Jab Ishq Sikhata Hai | जब इश्क़ सिखाता है



मुहम्मद नवेद अशरफ़ी  (शोधार्थी, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी)

जब इश्क़ सिखाता है आदाब-ए-ख़ुद आगाही 
खुलते हैं ग़ुलामों पर असरार-ए-शहंशाही          ।1।

अत्तार हो रूमी हो राज़ी हो ग़ज़ाली हो 
कुछ हाथ नहीं आता बे-आहे सहरगाही          ।2।

नौमीद न हो इनसे ऐ रहबर-ए-फ़रज़ाना 
कम कोश तो हैं लेकिन बेज़ौक़ नहीं राही          ।3।

ऐ ताइर-ए-लाहूती ! उस रिज़्क़ से मौत अच्छी 
जिस रिज़्क़ से आती हो परवाज़ में कोताही          ।4।

दारा-ओ-सिकन्दर से वो मर्द-ए-फ़क़ीर ऊला 
हो जिसकी फ़क़ीरी में बू-ए-असदुल्लाही          ।5।

आईन-ए-जवाँ मर्दाँ हक़ गोई-ओ-बेबाकी 
अल्लाह के शेरों को आती नहीं रूबाही           ।6। 
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व्याख्या:

जब इश्क़ सिखाता है आदाब-ए-ख़ुद आगाही 
खुलते हैं ग़ुलामों पर असरार-ए-शहंशाही          ।1।

इस शेर के दो मतलब हो सकते हैं। पहला, जब किसी शख़्स को अल्लाह तआला और उसके रसूल हज़रत मुहम्मद सल. से असीमित प्रेम (इश्क़) हो जाता है तो उस को आत्मज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। वह अपने अस्तित्व और वुजूद का मक़सद जान लेता है। ये भी जान लेता है कि उसका उदगम (Origin) क्या है। जब वो इन हक़ीक़तों से परिचित हो जाता है तो ईश्वर की सृष्टि में उसकी बादशाही के रहस्य उस पर खोल दिए जाते हैं। वह पहचान जाता है कि वह तो "अशरफ़ुल मख़लूक़ात" (अल्लाह द्वारा बनाई गयी सृष्टि में सर्वोत्तम) है !! उसको पता चल जाता है कि वो तो बादशाह है। ज़मीन में अल्लाह का ख़लीफ़ा है। वो किसी बंधन में तो नहीं बँधा है !! उसकी मंज़िल तो सिर्फ़ अल्लाह है जो सबसे बड़ा शहंशाह है। "ख़ुद-आगाही" के इस अहम बिन्दु को दर्शाते हुए अल्लामा बाल-ए-जिबरील में एक जगह फ़रमाते हैं:
तू ऐ असीर-ए-मकाँ, ला-मकाँ से दूर नहीं
वो जलवागाह तेरे ख़ाकदां से दूर नहीं। 
इसकी मिसाल अल्लाह के वालियों (वली का अर्थ दोस्त होता है। अर्थात अल्लाह के प्रियतम बन्दे) में मौजूद है जो अल्लाह के इश्क़ में हमेशा डूबे रहते हैं और जिन्हें अल्लाह प्रत्यक्ष-परोक्ष की बादशाही देता है। बड़े-बड़े राजा महाराजाओं को उनके क़दमों में सर के ताज रखते हुए देखा है।
दूसरा, जब किसी शख़्स को स्वयं की समझ आ जाती है तो उसके अंदर असीम शक्ति आ जाती है जिससे वह हर तरह की जकड़न, बंधन और दासता की बेड़ियों को तोड़ देता है। आत्मज्ञान और आत्मसम्मान की शक्ति उसे शहंशाह बना देती है। और यह सब अल्लाह के इश्क़ से मुमकिन हो पाता है। इसकी मिसाल अरब सभ्यता में मौजूद है जो हज़रत मुहम्मद के आगमन के बाद अज्ञानता तथा पाश्विकता के बंधनों से ऊपर उठकर दुनिया भर में छा गयी।
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इश्क़: अल्लाह और उसके रसूल हज़रत मुहम्मद सल. से प्रेम आदाब-ए-ख़ुद आगाही: आत्मज्ञान की शैली असरार-ए-शहंशाही: बादशाही के राज़
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अत्तार हो रूमी हो राज़ी हो ग़ज़ाली हो 
कुछ हाथ नहीं आता बे-आहे सहरगाही          ।2।

इस शेर में हज़रत फ़रीदुद्दीन अत्तार और हज़रत जलालुद्दीन रूमी (मौलाना रूम) का ज़िक्र है। ये लोग अल्लाह के वली गुज़रे हैं। इनके बाद हज़रत इमाम राज़ी और हज़रत इमाम ग़ज़ाली का नाम आया है जो बहुत बड़े विद्वानों में से थे। आहे-सहरगाही का मतलब है कि रात के बाद वाले हिस्से से पौ फटने तक अल्लाह की स्तुति और तारीफें बयान करना। अपनी नींद का सबसे बेहतरीन हिस्सा अल्लाह की वन्दना के लिए त्याग देना और अल्लाह के लिए आशिक़ाना ज़िंदगी बिताना।
अल्लामा कहते हैं कि कोई भी शख़्स अत्तार, रूमी, राज़ी और ग़ज़ाली जैसे अल्लाह के प्रियतम बन्दों के नक़्शे क़दम पर तब ही चल सकता, उनकी तरह तब ही कामयाब हो सकता है जब वो ईश्वर की याद में जागे, उसको याद करे और उससे दरबार में अपनी ज़रूरतों की पूर्ती के लिए प्रार्थना करे। यही वो काम है जो अत्तार को अत्तार बनाता है।
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अत्तार-रूमी-राज़ी-ग़ज़ाली: ये अल्लाह के वली (प्रिय बन्दे) और विद्वान गुज़रे हैं जिनको इन नामों से भी जाना जाता है- हज़रत फरीदुद्दीन अत्तार, हज़रत मौलाना रूमी, हज़रत इमाम राज़ी और हज़रत इमाम ग़ज़ाली आहे सहरगाही: भोर से पहले अल्लाह से दुआ करना
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नौमीद न हो इनसे ऐ रहबर-ए-फ़रज़ाना 
कम कोश तो हैं लेकिन बेज़ौक़ नहीं राही          ।3।

इस शेर में अल्लामा ने उम्मत-ए-मुस्लिमा के रहनुमा और पथ-प्रदर्शकों को अधीर और ना-उम्मीद न होने की हिदायत दी है। कहते हैं कि जिस क़ौम की हिदायत के लिए आप उनको सफ़र के लिए तैयार कर रहे हैं वो आपके साथ आपकी तरह रुचिवान हैं। इनके दिलों में भी ज्वाला जलती है लेकिन ये सफ़र की तंगियों को सहने में थोड़े कमज़ोर हैं। इनकी कमज़ोरी दूर करना और इनसे न-उम्मीद न होना।

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नौमीद: ना-उम्मीद रहबर: अधिनायक, रहनुमा, पथ-प्रदर्शक फ़रज़ाना: बुद्धिमान, अक़्लमन्द कोश: बर्दाश्त करने वाला, धैर्यवान बेज़ौक़: रुचिहीन बे-लुत्फ़ राही: यात्री
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ऐ ताइर-ए-लाहूती ! उस रिज़्क़ से मौत अच्छी 
जिस रिज़्क़ से आती हो परवाज़ में कोताही          ।4।

यहाँ 'ताइर-ए-लाहूती' का मतलब मुसलमान से है। लाहूत तसव्वुफ़ (सूफिज्म अथवा इस्लामी अध्यात्म) में वह ऊँची अवस्था जिसमें बन्दा (जीवात्मा) अल्लाह (परमात्मा) की ज़ात में पूरी तरह समाहित हो जाये अर्थात ख़ुद को ख़ुदा की ज़ात में ख़त्म कर दे ! इसके अलावा लाहूत के तीन अर्थ और हैं। पहला, अल्लाह की ज़ात। दूसरा, वह लोक जहाँ समय और सीमाओं के बंधन नहीं अर्थात आदिकाल। तीसरा, ईश्वर द्वारा दी गयी ऊर्जा जो हर ज़िंदा और मुर्दा चीज़ में विद्यमान है।अल्लामा इक़बाल ने मुसलमान को ताइर इसलिए कहा क्यूंकि सच्चा मुसलमान व्यापक दृष्टि वाला होता है। उसकी निगाह ज़मीन पर नहीं बल्कि आसमानों की बुलन्दियों पर होती है। जब उसकी निगाह इस लायक़ हो जाती है कि वह अल्लाह की निकटता और कुर्ब हासिल कर लेता है तो वह "फ़ना-फ़िल्लाह" अर्थात ख़ुदा की ज़ात में समाहित हो जाता है। वह मक़ामे लाहूत में जा पहुँचता है जो आध्यात्मिकता का सबसे ऊँचा मक़ाम होता है और इस अवस्था में वो 'ताइर-ए-लाहूती' कहलाता है।
अल्लामा का "ख़ुदी" का दर्शन और सिद्धान्त अल्लाह के इसी इश्क़ पर आधारित है। मुसलमान का परम गन्तव्य, बक़ौल अल्लामा, यही मक़ामे लाहूत है। इसी बात की उपमा उन्होंने "शाहीन" परिंदे से दी है जो उड़ान में सबसे ऊँचा, स्वाभिमानी और शक्तिशाली होता है। अल्लामा कई जगह इस बात को लिखते हैं जैसे:
फ़रंग से बहुत आगे है मंज़िल-ए-मोमिन
क़दम उठा ये मक़ाम इन्तेहा-ए-राह नहीं।
(पुस्तक: ज़र्ब-ए-कलीम)

समझता है तू राज़ है ज़िन्दगी
फ़क़त ज़ौक़-ए-परवाज़ है ज़िन्दगी।
(पुस्तक: बाल-ए-जिबरील)

हर एक मक़ाम से आगे मक़ाम है तेरा
हयात ज़ौक़-ए-सफ़र के सिवा कुछ और नहीं।
(पुस्तक: बाल-ए-जिबरील)

अल्लामा इस शेर में मुसलमानों को हिदायत (मार्गदर्शन) करते हुए फ़रमाते हैं कि तेरी असली मंज़िल आलम-ए-लाहूत है जहाँ तुझे अपने रब से इसी जीवन में मुलाक़ात करनी है। इसलिए तू हर तरह के भौतिकवाद से किनारा करके ईश्वर की ओर अग्रसर रह। अल्लाह के इश्क़ में डूबकर अपनी आत्मा को अलौकिक ऊर्जा से भर ले। तेरी आत्मा और शरीर की ग़िज़ा (आहार) वही होनी चाहिए जो तुझे तेरे रब से मुलाक़ात में अवरोध न बने। जो तेरी ऊर्जा को कम न करे और तेरी उड़ान में कोई अवगुण न आये।
इस शेर की दूसरी पंक्ति से यह अर्थ भी निकलता है कि मुसलमान को हलाल ग़िज़ा अर्थात वैध-आहार ही खाना चाहिए। किसी का हक़ मारना, चोरी, डकैती, लूटपाट, ब्याज इत्यादि से कमाई गयी जीविका आत्मा की अलौकिकता को कम करती है तथा ईश्वर के प्रेम में सबसे बड़ी बाधा होती है। इस्लाम के पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद ने हराम रोज़ी को "आग का गोला" कहा है जो दोज़ख (नर्क) की ओर ले जाता है और इस दुनिया में दुआओं की क़ुबूलियत में रोड़ा बनता है। ऐसे आहार को खाने से बहतर है कि मौत आ जाये क्यूकी ये आहार ईश्वर के मार्ग से पथभ्रष्ट करता है। हज़रत मुहम्मद सल. ने दो चीज़ों को दीन इस्लाम का आधार बताया: सिद्क़-ए-मक़ाल (बात में सच्चाई) और अक्ल-ए-हलाल (वैध-आहार अथवा हलाल रोज़ी)। अल्लामा ने इस बात को यूँ कहा:
सिर्र-ए-दीं सिद्क़-ए-मक़ाल अक्ल-ए-हलाल
ख़लवत-ओ-जलवत तमाशा-ए-जलाल।
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ताइर: परिन्दा, पक्षी लाहूत: तसव्वुफ़ (सूफिज्म अथवा इस्लामी अध्यात्म) में वह ऊँची अवस्था जिसमें बन्दा (जीवात्मा) अल्लाह (परमात्मा) की ज़ात में पूरी तरह समाहित हो जाये अर्थात ख़ुद को ख़ुदा की ज़ात में ख़त्म कर दे ! रिज़्क़: अन्न, अनाज परवाज़: उड़ान (Flight) कोताही: कमी, अवगुण, नुक़्स
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दारा-ओ-सिकन्दर से वो मर्द-ए-फ़क़ीर ऊला 
हो जिसकी फ़क़ीरी में बू-ए-असदुल्लाही          ।5।

बू-ए-असदुल्लाही से यहाँ तात्पर्य इस्लाम के चौथे ख़लीफ़ा हज़रत अली की दरिद्रता-दीनता (Poverty-Humility) से है। अल्लामा इक़बाल के सारे कलाम में हज़रत अली को मुसलमानों के लिए, विशेषकर मुस्लिम नौजवानों के लिए, बतौर रोल-मॉडल और आइडियल पेश किया गया है। अल्लाह और उसके रसूल से मुहब्बत का जज़्बा रखने का रहस्य यह है कि मनुष्य दरिद्रता का जीवन व्यतीत करे, विनम्रता और विनय के सदगुणों को अपनाये, जिनका सबसे बेहतरीन नमूना, बक़ौल अल्लामा, हज़रत अली अलैहिस्सलाम की ज़िन्दगी में मिलता है। अल्लामा इसी बात को इस तरह भी कहते हैं:
तेरी ख़ाक में है अगर शरर, तो ख़्याल-ए-फक़्र-ओ-ग़ना न कर
क: जहाँ में नान-ए-शईर पर है मदार-ए-क़ुव्वत-ए-हैदरी।
अल्लामा की हज़रत अली से मुहब्बत उनके "इश्क़" के सिद्धान्त का आधार बनती है। कहते है:
कभी तन्हाई-ए-कोह-ओ-दमन इश्क़
कभी सोज़-ओ-सुरूर-ओ-अंजुमन इश्क़
कभी सरमाया-ए-महराब-ओ-मिम्बर
कभी मौला अली ख़ैबर-शिकन इश्क़। 
अल्लामा के इन विचारों के प्रकाश में इस शेर का अर्थ यह निकलता है कि दारा और सिकन्दर चाहे कितने भी शक्तिशाली हों लेकिन उनसे बहतर वो दरिद्र और विनयशील व्यक्ति है जिसकी ज़िंदगी में हज़रत अली की दरिद्रता और विनयशीलता की छवि पायी जाती है। वही शख़्स अल्लाह के नज़दीक सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली है।
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दारा: ईरान का मशहूर बादशाह जिसे सिकंदर ने परास्त किया मर्द-ए-फ़क़ीर: विनीत जन, दरिद्र जन ऊला: बेहतर, श्रेष्ठतर फ़क़ीरी: दरिद्रता, ग़रीबी, विनय बू-ए-असदुल्लाही: हज़रत अली की खुश्बू (प्रेरणा)
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आईन-ए-जवाँ मर्दाँ हक़ गोई-ओ-बेबाकी 
अल्लाह के शेरों को आती नहीं रूबाही           ।6।

यह शेर पिछले शेर की व्याख्या ही है। पिछले शेर में "असदुल्लाह" इस्तेमाल किया गया था जो हज़रत अली का लक़ब है। इस शेर में "अल्लाह का शेर" को सीधे तौर पर लिख दिया गया है। अल्लामा कहते हैं कि जो मोमिन बन्दे होते हैं उनकी ख़ासियत ये होती है कि वो सच बोलते हैं और सच बोलने में बेबाक होते हैं।  सिवाय अल्लाह के किसी से नहीं डरते। वो तो अल्लाह के शेर होते हैं जिन्हे छल-कपट, मकर-ओ-फरेब से कोई काम नहीं होता।
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आईन: क़ानून, उसूल जवाँ मर्दाँ : हिम्मत वाला हक़ गोई: सच्ची बात कहना बेबाकी: निडर होकर बात कहना, निर्भय रूबाही: छल, कपट 

आबिदा परवीन की आवाज़ में सुनिए


मुनीर हुसैन की आवाज़ में सुनिए