बाल-ए-जिबरील

[Bal-e-Jibreel][bleft]

बांग-ए-दरा

[Bang-e-Dra][bleft]

ज़र्ब-ए-कलीम

[Zarb-e-Kaleem][bleft]

Lenin (Khuda Ke Huzoor Me) | लेनिन (ख़ुदा के हुज़ूर में)

मुहम्मद नवेद अशरफ़ी 

ऐ अनफ़स-ओ-आफ़ाक़ में पैदा तेरे आयात
हक़ यह है क: है ज़िन्दा-ओ-पाइन्दा तेरी ज़ात   ।1।

मैं कैसे समझता क: तू है या क: नहीं है
हर दम मुतग़य्युर थे ख़िरद के नज़रियात    ।2।

महरम नहीं फ़ितरत के सरूद-ए-अज़ली से
बीना ए कवाकिब हो क: दाना-ए-नबातात !    ।3।

आज आँख ने देखा तो वो आलम हुआ साबित !
मैं जिस को समझता था कलीसा के ख़ुराफ़ात।    ।4।

हम बन्द-ए-शब-ओ-रोज़ में जकड़े हुए बन्दे
तू ख़ालिक़-ए-आसार-ओ-निगारिन्दाह-ए-आनात !     ।5।

इक बात अगर मुझको इजाज़त हो तो पूछूँ
हल कर न सके जिसको हकीमों के मक़ालात !    ।6।

जब तक मैं जिया ख़ैमा-ए-अफ़लाक के नीचे
कांटे की तरह दिल में खटकती रही यह बात।    ।7।

गुफ़्तार के असलूब पे क़ाबू नहीं रहता
जब रूह के अन्दर मुतलातुम हों ख़्यालात।    ।8।

वो कौन सा आदम है क: तू जिस का है माबूद ?
वो आदम-ए-ख़ाकी क: जो है ज़ेर-ए-समावात ?    ।9।

मशरिक़ के खुदावन्द सुफ़ैदान-ए-फ़रंगी !
मग़रिब के खुदावन्द दरख़शन्दा फ़िलिज़्ज़ात !    ।10।

योरप में बहुत रौशनी-ए-इल्म-ओ-हुनर है
हक़ यह है क: बे-चश्मा-ए-हैवां है यह ज़ुल्मात !    ।11।

रानाई-ए-तामीर में, रौनक़ में, सफ़ा में
गिरजों से कहीं बढ़ के हैं बंकों के इमारात !    ।12।

ज़ाहिर में तिजारत है, हक़ीक़त में जुआ है
सूद एक का लाखों के लिए मर्ग-ए-मुफ़ाजात !    ।13।

यह इल्म, यह हिकमत, यह तदब्बुर, यह हुकूमत !
पीते हैं लहू, देते हैं तालीम-ए-मुसावात !    ।14।

बेकारी-ओ-उरयानी-ओ-मयख़्वारी-ओ-अफ़लास
क्या कम हैं फ़रंगी मदनिययत के फुतुहात !    ।15।

वो क़ौम क: फ़ैज़ान-ए-समावी से हो महरूम
हद उसके कमालात की है बर्क़-ओ-बुख़ारात !    ।16।

है दिल के लिए मौत मशीनों की हुकूमत !
अहसास-ए-मुरव्वत को कुचल देते हैं आलात !    ।17।

आसार तो कुछ कुछ नज़र आते हैं क: आख़िर
तदबीर को तक़दीर के शातिर ने किया मात।    ।18।

मयख़ाने की बुनियाद में आया है तज़लज़ुल
बैठे हैं इसी फ़िक्र में पीरान-ए-ख़राबात।    ।19।

चेहरों पे जो सुर्ख़ी नज़र आती है सरे शाम
या ग़ाज़ा है या साग़र-ओ-मीना की करामात।    ।20।

तू क़ादिर-ओ-आदिल है, मगर तेरे जहाँ में
है तल्ख़ बहुत बन्दा-ए-मज़दूर के औक़ात     ।21।

कब डूबेगा सरमाया-परस्ती का सफ़ीना ?
दुनिया है तेरी मुन्तज़िर-ए-रोज़े मकाफ़ात !     ।22।
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व्याख्या:
अल्लामा इक़बाल के इस कलाम में उनके उस नज़रिये का पता चलता है जिसके तहत वो पूँजीवाद का कड़ा विरोध करते हैं। अल्लामा के इस कलाम को अगले दो कलामों के साथ पढ़ा जाना चाहिए जिनके शीर्षक क्रमशः फ़रिश्तों का गीत और फ़रमाने ख़ुदा (फ़रिश्तों से ) हैं। प्रस्तुत रचना में इक़बाल ने लेनिन के ज़रिये अपनी बात का मंचन किया है, वास्तव में लेनिन और ख़ुदा की इस तरह की मुलाक़ात का कोई प्रमाण नहीं है। लेनिन रूस के साम्यवादी क्रांतिकारी (Communist Revolutionary) थे जो मशहूर दार्शनिक कार्ल मार्क्स के उसूलों के पैरोकार थे, धर्म और ईश्वर में विश्वास नहीं करते थे। नास्तिक थे। रोज़-ए-क़यामत (Day of Resurrection) पर भी यक़ीन नहीं रखते थे। मरणोपरान्त लेनिन ख़ुदा के सामने पेश किये जाते हैं और अपनी बात को परमात्मा के समक्ष रखते हैं। इस रचना में कुल 22 शेर हैं जिनकी व्याख्या इस प्रकार है:

ऐ अनफ़स-ओ-आफ़ाक़ में पैदा तेरे आयात
हक़ यह है क: है ज़िन्दा-ओ-पाइन्दा तेरी ज़ात   ।1।

पहले शेर में लेनिन ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकारते हैं।  कहते हैं कि ऐ मालिक! हर प्राणवान अथवा जानदार चीज़ में तेरी निशानियाँ मौजूद हैं, आकाश में तेरे अस्तित्व की असंख्य निशानियाँ हैं।  तू ही परम सत्य है।  सच तो यह है कि तू अस्तित्वमय, सजीव, चिरकालिक और अनन्त है। अल्लामा इक़बाल ने इस शेर को क़ुरआन मजीद की एक आयत से व्युत्पन्न किया है।  क़ुरआन कहता है: और निरा विश्वास रखने वालों (साहिबान-ए-ईक़ान) के लिए  ज़मीन में बहुत सी निशानियाँ हैं। और ख़ुद तुम्हारे नफ़्स (जान) में भी। सो क्या तुम [इन निशानियों को] देखते नहीं हो ! (क़ुरआन 51:20-21)
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ख़ुदा के हुज़ूर में: ख़ुदा के सामने अनफ़स: नफ़स (जान, प्राण) का बहुवचन आफ़ाक़: उफ़ुक़ (क्षितिज-horizon) का बहुवचन आयात: आयत का बहुवचन अर्थात निशानियाँ क: कि पाइन्दा: क़ायम रहने वाला, जीवंत, चिरकालिक, अनादि ज़ात: अस्तित्व हक़ीक़त, शख़्सियत
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मैं कैसे समझता क: तू है या क: नहीं है
हर दम मुतग़य्युर थे ख़िरद के नज़रियात    ।2।

अपनी किंकर्त्तव्यविमूढ़ता और कशमकश को बयान करते हुए लेनिन कहते हैं कि मैं कैसे जान पाता कि कायनात में तेरा वजूद है या नहीं हैं। मैं ख़िरद (बुद्धि) की दलीलों में उलझ कर रह गया जो समय-समय पर बदलती रहती थीं, अस्थिर रहती थीं और मुझे भी हर दम अस्थिर रखती थीं। 
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मुतग़य्युर: बदलते रहने वाले, अस्थिर ख़िरद: अक़्ल, बुद्धि नज़रियात: नज़रिया का बहुवचन, सिद्धान्त, देखने परखने का अंदाज़ 
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महरम नहीं फ़ितरत के सरूद-ए-अज़ली से
बीना ए कवाकिब हो क: दाना-ए-नबातात !    ।3। 

इस शेर में दो अहम चीज़ों का ज़िक्र किया गया है। ब्रह्माण्ड की रचना, जीवन का विकास और आधुनिक विज्ञान। इन दोनों को क्रमश:  'फ़ितरत के सरूद-ए-अज़ली', 'बीना ए कवाकिब' तथा 'दाना-ए-नबातात' के रूप में काव्यबद्ध किया गया है। लेनिन कहते है कि आदिकाल काल के सृजन संगीत यानि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के राज़ और जीवन का विकास तथा उससे जुड़ी हक़ीक़तों को केवल दैवीय इल्हाम अथवा श्रुति (Divine Revelation) के द्वारा ही जाना जा सकता है। वनस्पति शास्त्री अथवा उद्भववादी विचारक इससे परिचित नहीं हैं। और दैवीय इल्हाम, आयतों और आध्यात्म को मैं कैसे मान लेता जबकि मेरी अक़्ल ने मुझे जकड़े रखा ! 
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महरम: परिचित, आगाह, हमराज़ फ़ितरत: प्रकृति (nature) सरूद: संगीत अथवा गीत अज़ली: हमेशा से रहने वाला बीना: दृष्टि, आँख कवाकिब: कोकब का बहुवचन (कोकब- चमकदार सितारा) दाना: बुद्धिमान नबातात: नबात का बहुवचन (नबात-पेड़ पौधे, पादप जगत) दाना-ए-नबातात: वनस्पति शास्त्री (Botanist) 
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आज आँख ने देखा तो वो आलम हुआ साबित !
मैं जिस को समझता था कलीसा के ख़ुराफ़ात।    ।4।

आज मैं तेरे सामने खड़ा हूँ तो सब कुछ अपनी आँखों से देख सकता हूँ।  तेरे दरबार में यह सिद्ध हो चुका है कि तेरा वजूद, हिसाब का दिन और मौत के बाद की दुनिया सब कुछ सच था जो कि मैं जीवन रहते देख नहीं सका और हमेशा यह समझता रहा कि ये सब तो मनगढ़त बातें और मज़हबी बकवास है।
यहाँ कलीसा के ख़ुराफ़ात को 'मज़हबी बकवास' का अर्थ दिया गया है।
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कलीसा: चर्च ख़ुराफ़ात: स्वांग, बकवास, बेकार बात
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हम बन्द-ए-शब-ओ-रोज़ में जकड़े हुए बन्दे
तू ख़ालिक़-ए-आसार-ओ-निगारिन्दाह-ए-आनात !     ।5।

ऐ मालिक ! हम दिन और रात की सीमाओं में बंधे हुए हैं।  समय की सीमाओं को लांघ नहीं सकते। समय की बेड़ी हमारे पैरों को जकड़े हुई है। हम इससे आगे कुछ सोचते ही नहीं हैं। लेकिन तू ज़मानों और काल का सृष्टा है, तू ही युगों का निर्माण करता है।  तू ही समय को नियंत्रित करता है।
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बन्द: बाधा, बेड़ी शब-ओ-रोज़: रात-दिन ख़ालिक़: सृष्टा, ब्रह्माण्ड को पैदा करने वाला आसार: अस्र का बहुवचन (अस्र- ज़माना, काल, Time) निगारिन्दाह: रचना करने वाला, शक्ल देने वाला आनात: लम्बा समय, युग (aeon) 
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इक बात अगर मुझको इजाज़त हो तो पूछूँ
हल कर न सके जिसको हकीमों के मक़ालात !    ।6। 

लेनिन बहुत आदर और अदब के साथ अल्लाह से कहते हैं कि ऐ मालिक! अगर तेरी आज्ञा मिले तो एक बात पूछूँ। वो बात जो मेरी समझ में कभी नहीं आई हालाँकि मैंने कितने ही विद्वानों के शोधपत्र पढ़ डाले, उनके अनुसन्धान और अन्वेषण को ग़ौर से देखा !
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हकीमों: हकीम का बहुवचन (हकीम- विद्वान, बुद्धिमान) मक़ालात: मक़ाला का बहुवचन (मक़ाला- शोधपत्र, प्रवचन, कथन) 
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जब तक मैं जिया ख़ैमा-ए-अफ़लाक के नीचे
कांटे की तरह दिल में खटकती रही यह बात।    ।7।

जब तक में आसमान के नीचे जीवन व्यतीत करता रहा, तब तक वो अमुक बात मेरे दिल में काँटे की तरह चुभती रही। जिसकी वजह से मेरा मन सुकून नहीं पा सका और असमंजस्य में ही रहा। 
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जिया: व्यतीत किया (Lived) ख़ैमा: तम्बू (Tent) अफ़लाक: फलक का बहुवचन (फ़लक-आसमान)
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गुफ़्तार के असलूब पे क़ाबू नहीं रहता
जब रूह के अन्दर मुतलातुम हों ख़्यालात।    ।8। 

जब आत्मा, मन और मस्तिष्क में विचारों का बवण्डर मौजूद होता है तो बहुत सारे सवाल उठते हैं।  मनुष्य इतना  मजबूर हो जाता है कि उसे अपनी ज़ुबान पर भी क़ाबू नहीं रहता। इस दशा में वह बोल-चाल का अदब और तरीका सब भूल जाता है।
यहाँ इक़बाल ये दिखाना चाहते हैं कि जब इंसान अपनी ज़ुबान पर नियंत्रण खो देता है तो जो मन में आता है, वो कहता है। यहाँ तक कि ईश्वर के अस्तित्व को भी मशकूक (शक के दायरे) में कर देता है।
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गुफ़्तार: बात करना, बोलचाल असलूब: ढंग, तरीक़ा, अंदाज़ मुतलातुम: तलातुम के रूप में (तलातुम-समुन्द्र की शक्तिशाली लहरें जो बहुत शोर करती हैं), लेहरों का बवण्डर ख़्यालात: ख़्याल का बहुवचन (ख़्याल-विचार) 
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वो कौन सा आदम है क: तू जिस का है माबूद ?
वो आदम-ए-ख़ाकी क: जो है ज़ेर-ए-समावात ?    ।9।

लेनिन अपना सवाल पूछते हैं कि ऐ मालिक! तू किस का ख़ुदा है? वो आदम की कौन सी सन्तान है जिसका तू ख़ुदा है, पूज्य है, इलाह है? क्या वो नस्ले आदम वो इन्सान है जो मिटटी का बना हुआ है, आसमान के नीचे ज़मीन पर रहता है? इक़बाल लेनिन के ज़रिये यह कहना चाहते हैं हक़ीक़त में तुझे कोई ख़ुदा मानता ही नहीं है।  इस शेर का भाव अगले शेर से बिल्कुल स्पष्ट हो जायेगा। 
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आदम: हज़रत आदम, पृथ्वी पर क़दम रखने वाले पहले इंसान माबूद: जिसकी इबादत की जाये, पूज्य अर्थात अल्लाह ख़ाकी: ख़ाक (मिटटी) से बना हुआ ज़ेर-ए-समावात: समावात (आसमान) के नीचे
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मशरिक़ के खुदावन्द सुफ़ैदान-ए-फ़रंगी !
मग़रिब के खुदावन्द दरख़शन्दा फ़िलिज़्ज़ात !    ।10।

ऐ प्रभु! नस्ले आदम पूरब और पश्चिम के दो हिस्सों में पहचानी जाती है।  मशरिक़ यानि पूरब के बाशिन्दे पश्चिम के लोगों, उनके तौर-तरीक़ो और पाश्चात्य सभ्यता (Western Culture) को अपना ख़ुदा मानते हैं। जबकि दूसरी ओर पश्चिम के बाशिन्दे दरख़शंदा फ़िलीज़्ज़ात अर्थात चमकीली धातुओं, धन-दौलत और भौतिकवादी ऐश्वर्य को पूजते हैं। तुझे कोई अपना ख़ुदा नहीं मानता !!
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मशरिक़: पूर्व (East) खुदावन्द: ईश्वर, ख़ुदा, पूजनीय सुफ़ैदान: सफ़ेद चमड़ी वाले (White) फ़रंगी: यूरोपियन मग़रिब: पश्चिम (West) दरख़शन्दा फ़िलिज़्ज़ात: बहुमूल्य चमकीली धातुएँ जैसे सोना, चाँदी
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योरप में बहुत रौशनी-ए-इल्म-ओ-हुनर है
हक़ यह है क: बे-चश्मा-ए-हैवां है यह ज़ुल्मात !    ।11।

वैसे तो यूरोप में ज्ञान और कौशल की बहुत रौशनी नज़र आती है लेकिन ये रौशनी आत्मा को जीवन नहीं देती। वास्तव में, ये झूठी रौशनी एक अँधेरे सोते से निकलती है जिसमें जीवन मौजूद नहीं। इसमें आत्मा का पोषण , मानव कल्याण , प्रेम और सौहार्द नहीं पाया जाता।  सब कुछ भौतिकवादी और शोषण से प्रेरित है। यहाँ अंधकार के दो रूप हैं , आत्मिक और दूसरा सामाजिक।
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योरप: यूरोप रौशनी-ए-इल्म ओ-हुनर: ज्ञान व कौशल का प्रकाश बे-चश्मा-ए-हैवां: जीवनदायी सोता के बिना (Without Fountain of Life) ज़ुल्मात: ज़ुल्मत का बहुवचन (ज़ुल्मत- अन्धकार, अँधेरा)
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रानाई-ए-तामीर में, रौनक़ में, सफ़ा में
गिरजों से कहीं बढ़ के हैं बंकों के इमारात !    ।12।

यह जग-ज़ाहिर है कि यूरोपीय देशों में बैंको की इमारतें गिरजाघरों यानि इबादत गाहों से कहीं ज़्यादा तरजीह पाती हैं। बैंकें वास्तु, संरचना, भव्यता, प्रतिष्ठा और ऐश्वर्य में गिरजों से कहीं अधिक अधिमान प्राप्त हैं। लोग आध्यात्मिक न होकर माया के पुजारी हैं।
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रानाई: सुन्दरता, हुस्न, ख़ूबसूरती तामीर: इमारत, भवन या वास्तु-कला रौनक़: वैभव, ऐश्वर्य, शानोशौकत सफ़ा: महिमा, प्रतिष्ठा, यश (Glory ) बंकों के इमारात: बैंकों की इमारतें
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ज़ाहिर में तिजारत है, हक़ीक़त में जुआ है
सूद एक का लाखों के लिए मर्ग-ए-मुफ़ाजात !    ।13।

बैंकों में होने वाला धंधा प्रत्यक्ष रूप में तो बस व्यापार ही नज़र आता है किन्तु वास्तविकता में यह एक जुआ है। इसका आधार सूदखोरी और ब्याज है जिससे एक पूँजीपति अथवा राज्य को तो बहुत फ़ायदा पहुँचता है लेकिन वही फ़ायदा लाखों लोगों के लिए एक "मौत का झपट्टा" होता है जो यकायक उनको मौत की नींद सुला देता है।  अर्थात उनकी आर्थिक और सामाजिक ज़िन्दगी को तबाह और बर्बाद कर देता है। 
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तिजारत: व्यापार, बिज़निस हक़ीक़त: वास्तविकता सूद: ब्याज (Interest) मर्ग: मौत, मृत्यु मुफ़ाजात: अचानक, यकायक (Swoop)
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यह इल्म, यह हिकमत, यह तदब्बुर, यह हुकूमत !
पीते हैं लहू, देते हैं तालीम-ए-मुसावात !    ।14।

पश्चिम का ज्ञान, मेधा, क़ाबलियत, ज्ञान के क्षेत्र में उनका अनुसन्धान, उनकी हुकूमतें और राजव्यवस्थाएं अप्रासांगिक हैं क्यूंकि एक तरफ़ तो वो समता, समानता, और बराबरी की वकालत करते हैं किन्तु दूसरी तरफ़ वे पूँजीवादी व्यवस्था को सशक्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। शोषण का साम्राज्य ज्यों का त्यों बना रहता है जो सामान्य जन का ख़ून चूसता रहता है।
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इल्म: ज्ञान, मेधा (Wisdom) हिकमत: दर्शन, फ़लसफ़ा (Philosophy) तदब्बुर: शोध, अनुसन्धान, ग़ौर-ओ-फ़िक्र (Research and Intellect) हुकूमत: सत्ता तालीम-ए-मुसावात: बराबरी और समानता की शिक्षा
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बेकारी-ओ-उरयानी-ओ-मयख़्वारी-ओ-अफ़लास
क्या कम हैं फ़रंगी मदनिययत के फुतुहात !    ।15।

यूरोपीय अथवा पश्चिमी देशों ने दुनिया और समाज को क्या दिया है! यदि उनकी विजय गाथाओं की बात की जाये तो बेरोज़गारी, तन पर कपड़ों का अभाव , शराबखोरी और घोर ग़रीबी जैसे शब्द ही शामिल किये जा सकते हैं। समाज की इन महत्वपूर्ण बुराईयों को ख़त्म करने में पश्चिमी सभ्यता न सिर्फ़ बिलकुल नाकाम हुई है बल्कि इसने इन विकारों को बहुत तेज़ी से बढ़ाया भी है। ऐसे में पश्चिम का गुणगान और महिमामण्डन निराधार है।
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बेकारी: बेरोज़गारी (Unemployment ) उरयानी: बदन पर कपड़ो का न होना, नग्नता, बदन का नंगा होना (nakedness) मयख़्वारी: शराबखोरी, शराब की लत अफ़लास: ग़रीब लोग फ़रंगी मदनिययत: यूरोपीय शहरीपन फुतुहात: विजयगाथाएँ, फ़तेह का बहुवचन (फ़तेह- विजय)
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वो क़ौम क: फ़ैज़ान-ए-समावी से हो महरूम
हद उसके कमालात की है बर्क़-ओ-बुख़ारात !    ।16।

वो लोग जिन पर आसमानी रहमतें अथवा अल्लाह की अनुकम्पा नहीं होती उनका कमाल अर्थात परिपूर्णता अपने उत्कर्ष को नहीं पहुँच पाती। जिन्हें ईश्वर का सामिप्य नहीं मिलता उनकी परिपूर्णता केवल बिजली और भाप [के इंजन] तक ही सीमित रहती है और मशीनी दुनिया बनाना कोई उत्कर्ष तो नहीं जब तक कि समाज में दया का भाव न हो।
इस शेर का दूसरा पहलू यह है कि जिन लोगो को दैवीय अनुकम्पा नहीं मिलती वो भौतिक तरक़्क़ी तो कर सकते हैं किन्तु आत्मा की तरक़्क़ी से वंचित रहते हैं।
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फ़ैज़ान-ए-समावी: ईश्वरीय अनुकम्पा, परोक्षीय अनुकम्पा महरूम: वंचित (Denied ) कमालात: कमाल का बहुवचन (कमाल- पूर्ति, तकमील, Completeness) बर्क़-ओ-बुख़ारात: बिजली और भाप, बिजली और धूल, अभिशप्त और विषादपूर्ण
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है दिल के लिए मौत मशीनों की हुकूमत !
अहसास-ए-मुरव्वत को कुचल देते हैं आलात !    ।17।

दुनिया में मशीनों की हुकूमत से सामाजिक एवम आर्थिक समीकरण बिगड़ जाते हैं। पूँजीवाद पर आधारित समाज में धनिक लोग दौलत की भूख में पागल हो जाते हैं, उनका दिल मुर्दा हो जाता है। मानवीय संवेदनाएँ और इंसानों,जानवरों, पेड़-पौधों के लिए मुहब्बत का अहसास ख़त्म हो जाता है। मशीनें भाईचारे और मेल-जोल को कुचल देती हैं।
अल्लामा का यह शेर बहुत दूरदर्शी है। 1980-90 के दशकों  के बाद मुक्त बाज़ार (Liberal Markets) की विभीषिका "विकासशील देशों" को तबाह करने पर तुली हैं। भारत में रेड-कॉरिडोर से प्रभावित राज्य इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं जहाँ आदिवासी अपनी ज़मीनों, जंगलों आदि की तबाही पर कुंठा और क्रोध में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। एक तरफ आदिवासी और क़बीलों में रहने वाले प्रकृति से बेहद मुहब्बत करते हैं वहीं दूसरी तरफ़ पूँजीवाद और मशीनों को पूजने वाले किसी प्रकार की मुहब्बत नहीं रखते !
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अहसास-ए-मुरव्वत: दया की अनुभूति (Kindness) आलात: आला का बहुवचन (आला-उपकरण, यंत्र, मशीन)
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आसार तो कुछ कुछ नज़र आते हैं क: आख़िर
तदबीर को तक़दीर के शातिर ने किया मात।    ।18।

संकेत नज़र आते हैं कि जो कुछ पश्चिम जगत ने अपने खोखले ज्ञान के बल पर निर्माण किया है वो ख़ुशक़िस्मती से एक दिन ज़रूर ख़त्म हो जाएगा और समाज देखेगा कि किस तरह बड़ी मेहनतों से बिछाया गया पूँजीवाद का जाल ग़रीबों की क़िस्मत से मात खा जायेगा, हार जायेगा।
इस शेर में इक़बाल को उम्मीद नज़र आती है कि हालात ज़रूर बदलेंगे। इक़बाल की इस बात की झलक कार्ल मार्क्स के साम्यवादी राज्य की कल्पना से मेल खाती है जिनको लेनिन अपना गुरु मानते थे।
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तदबीर: यत्न, महनत, पुरुषार्थ तक़दीर: भाग्य, क़िसमत शातिर: शतरंज की चाल चलने वाला, चालाक
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मयख़ाने की बुनियाद में आया है तज़लज़ुल
बैठे हैं इसी फ़िक्र में पीरान-ए-ख़राबात।    ।19।

पश्चिम में पूँजीवाद की मधुशाला में भूकम्प आगया है। इसकी बुनियादें हिल गयी हैं। ऐसे में बड़े -बड़े पूंजीवादी दिग्गज इस मयख़ाने की रक्षा के लिए चिंतित हैं। उनको अपना भविष्य ख़तरे में नज़र आ रहा है।
इस शेर में ऐसा प्रतीत होता है कि इक़बाल मज़दूरों द्वारा कारखानों में बरपा किए गए इंक़लाब (क्रान्ति )को  उम्मीद की नज़र से देख रहे हों।
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मयख़ाने: शराबख़ाने,  मधुशाला (Wine Shop) तज़लज़ुल:भूकम्प, हिलना, कम्पित होना, जुम्बिश पीरान-ए-ख़राबात: शराबखानों के वृद्धजन
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चेहरों पे जो सुर्ख़ी नज़र आती है सरे शाम
या ग़ाज़ा है या साग़र-ओ-मीना की करामात।    ।20।

शाम के वक़्त इन दिग्गजों  के चेहरों पर जो लालिमा नज़र आती है ये असली नहीं है , यह आत्मा का हुस्न नहीं है।  यह तो सौंदर्य प्रसाधनों जैसे कॉस्मेटिक पाउडर अथवा शराब -मदिरा के चमत्कार है। जब वक़्त आएगा तो यह सुर्ख़ियां स्वयं ग़ायब हो जाएँगी।
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सुर्ख़ी: लालिमा (Rosiness, Flush) सरे शाम: सांयकाल, शाम के वक़्त ग़ाज़ा: सुर्ख़ी पाउडर, उबटन साग़र: शराब का प्याला, जाम मीना: शराब की बोतल, सुराही करामात: करामत का बहुवचन (करामत-मौजज़ा, चमत्कार)
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तू क़ादिर-ओ-आदिल है, मगर तेरे जहाँ में
है तल्ख़ बहुत बन्दा-ए-मज़दूर के औक़ात     ।21।

ऐ मालिक ! तू सर्वशक्तिमान है और सबसे बड़ा इन्साफ़ करने वाला भी है। इसके बावजूद भी तेरी पैदा की गयी दुनिया में मज़दूरों के हालत बहुत ख़स्ता [क्यों] हैं ! उनकी औक़ात और हैसियत बेहद बुरी [क्यों] है।
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क़ादिर: कुछ भी करने की शक्ति रखने वाला, सर्वशक्तिमान, ख़ुदा आदिल: इन्साफ़ करने वाला तल्ख़: कठोर, रूखा, कड़ा, निष्ठुर (Harsh) बन्दा-ए-मज़दूर: मज़दूर वर्ग औक़ात:  हैसियत, बिसात, वक़्त का बहुवचन अर्थात ज़माने  
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कब डूबेगा सरमाया-परस्ती का सफ़ीना ?
दुनिया है तेरी मुन्तज़िर-ए-रोज़े मकाफ़ात !     ।22।

ऐ ख़ुदा ! पूँजीवाद का यह विशालकाय बेड़ा कब डूबेगा ? दुनिया उस दिन का इंतेज़ार कर रही है कि जब ख़ून चूसने वाले पूंजीवादियों को उनके कर्मों का बदला दिया जायेगा !
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सरमाया-परस्ती: पूँजीवाद (Capitalism) सफ़ीना: बेड़ा, जलयान, बहुत बड़ा जहाज़ (Galley) मुन्तज़िर: इंतज़ार करने वाला, प्रतीक्षा करने वाला रोज़े मकाफ़ात: बदले का दिन
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