बाल-ए-जिबरील

[Bal-e-Jibreel][bleft]

बांग-ए-दरा

[Bang-e-Dra][bleft]

ज़र्ब-ए-कलीम

[Zarb-e-Kaleem][bleft]

Prelude to Bal-e-Jibreel | बाल-ए-जिबरील की भूमिका


फूल की पत्ती से कट सकता है हीरे का जिगर
मर्द-ए-नादाँ पर कलाम-ए-नर्म-ओ-नाज़ुक बे-असर

अल्लामा इक़बाल ने इस शेर को बाल-ए-जिबरील की भूमिका बनाया है। इस शेर का उद्गम अल्लामा ने राजा भर्तृहरि के 'नीति शतक' के छठे श्लोक को बताया है जो इस प्रकार है:

इस श्लोक को अपने शब्दों में पिरोकर अल्लामा यह सन्देश देना चाहते हैं कि यद्यपि बाल-ए-जिबरील में एक से बढ़कर एक इल्मी नुक्ते बयान किए गए हैं लेकिन जो लोग बुद्धि एवं विवेक से ख़ाली हैं, उनको इस रचना से कोई लाभ नहीं पहुँच सकता है।

याद रहे कि राजा भर्तृहरि प्राचीन भारत में मालवा के नरेश थे जिन्होंने अपना राज-पाट त्यागकर वैराग्य का जीवन अपनाया तथा नीति शतक की रचना की।