बाल-ए-जिबरील

[Bal-e-Jibreel][bleft]

बांग-ए-दरा

[Bang-e-Dra][bleft]

ज़र्ब-ए-कलीम

[Zarb-e-Kaleem][bleft]

Main aur Tu | मैं और तू


न सलीक़ा मुझ में कलीम का, न क़रीना तुझ में ख़लील का
मैं हलाक-ए-जादू-ए-सामरी, तू क़तील-ए-शैवा-ए-आज़री।

मैं नवाए सोख़्ता दर गुलु, तू परीदा रंग, रमीदा बू
मैं हिकायत-ए-ग़म-ए-आरज़ू, तू हदीस-ए-मातम-ए-दिलबरी।

मेरा ऐश ग़म, मेरा शहद सम, मेरी बूद हमनफ़स-ए-अदम
तेरा दिल हरम, गरव-ए-अजम, तेरा दीं ख़रीदा-ए-काफ़िरी।

दम-ए-ज़िन्दगी, रम-ए-ज़िन्दगी, ग़म-ए-ज़िन्दगी, सम-ए-ज़िन्दगी
ग़म-ए-रम न कर, सम-ए-ग़म न खा क: यही है शान-ए-क़लन्दरी।

तेरी ख़ाक में है अगर शरर तो ख़्याल-ए-फ़क़्र-ओ-ग़ना न कर
क: जहाँ में नान-ए-शईर पर है मदार-ए-क़ुव्वत-ए-हैदरी।

कोई ऐसी तर्ज़-ए-तवाफ़ तू मुझे ऐ चराग़-ए-हरम बता
क: तेरे पतंग को फिर अता हो वही सरिश्त-ए-समन्दरी।

गिला-ए-जफ़ा-ए-वफ़ानुमा क: हरम को अहले-हरम से है
किसी बुतकदे में बयाँ करूँ तो कहे सनम भी 'हरि-हरि'।

न सतीज़ागाहे जहाँ नई, न हरीफ़े पंजाफ़िगन नए
वही फ़ितरत-ए-असदुल्लही वही मरहबी वही अन्तरी।

करम ऐ शहे अरब-ओ-अजम क: खड़े हैं मुन्तज़िर-ए-करम
वो गदा क: तूने अता किया है जिन्हें दिमाग़-ए-सिकन्दरी।
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व्याख्या:

अल्लामा इक़बाल के उर्दू संकलन बांग-ए-दरा की यह कठिन रचनाओं में से एक रचना है। विषयवस्तु के अतिरिक्त काव्यशैली एवं शायरी की कला उच्चकोटि की है। शीर्षक "मैं और तू" में "मैं" स्वयं शायर है और "तू" इस रचना को पढ़ने वाला है अथवा वो मुस्लिम समाज है जिसे अल्लामा इक़बाल सम्बोधित कर रहे हैं।
 
न सलीक़ा मुझ में कलीम का, न क़रीना तुझ में ख़लील का
मैं हलाक-ए-जादू-ए-सामरी, तू क़तील-ए-शैवा-ए-आज़री।

इक़बाल कहते हैं न मुझमे हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की तरह अल्लाह से मुलाक़ात की जिज्ञासा मौजूद है और न तुझ में हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम जैसा ईमान पाया जाता है। मैं यदि जादूगर सामरी का अनुसरण करता हूँ तो तू उन कामों को अन्जाम देता है जो तौहीद (एकेश्वरवाद) के विरुद्ध हैं। शेर का सार यह है कि सम्पूर्ण मुस्लिम उम्मत दीन इस्लाम के रास्ते से भटक गयी है। दैनिक जीवन में मुस्लिम क़ौम के कार्यों का केन्द्रबिन्दु 'अल्लाह से मुलाक़ात' नहीं है और यह हर वो काम कर करती है जिसकी तौहीद आज्ञा नहीं देती।
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कलीम का सलीक़ा: अल्लाह का दीदार करने की हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की जिज्ञासा और इच्छा ख़लील का क़रीना: हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की ईश्वर में अडिग आस्था और विश्वास सामरी: यह वह व्यक्ति था जिसने हज़रत मूसा की अनुपस्थिति में सोने का बछड़ा बनाया था और लोगो से उसकी पूजा आरम्भ करवाई थी। उसका नाम मूसा बिन ज़फ़र था लेकिन 'सामरी' उसके क़बीले का नाम था। क़तील: मक़तूल अर्थात जिसको क़त्ल किया गया हो। आज़री: बुत अथवा मूर्ति बनाना, बुतपरस्ती।
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मैं नवाए सोख़्ता दर गुलु, तू परीदा रंग, रमीदा बू
मैं हिकायत-ए-ग़म-ए-आरज़ू, तू हदीस-ए-मातम-ए-दिलबरी।

मेरी हालत उस नाकाम आशिक़ के समान है जो अपनी अवस्था भी किसी को बताना नहीं चाहता और उससे अपने दुःख-दर्द भी साझा नहीं करना चाहता और तू निरन्तर मुसीबतों के कारण बेजान हो चुका है। मेरे पास दुःख के सिवा कुछ नहीं और तो हर समय अपनी बद-नसीबी और मुसीबतों का मातम करता रहता है। तात्पर्य है कि पूरी मुस्लिम क़ौम तबाह हो चुकी है
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नवाए सोख़्ता दर गुलु: इसका सन्दर्भ नामुरादी या नाकामयाबी से है।
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मेरा ऐश ग़म, मेरा शहद सम, मेरी बूद हमनफ़स-ए-अदम
तेरा दिल हरम, गरव-ए-अजम, तेरा दीं ख़रीदा-ए-काफ़िरी।

मेरी वास्तविकता यह है कि मुझे ऐश में कोई लुत्फ़ अथवा मज़ा महसूस नहीं होता और मेरी ख़ूबी भी दुनिया को बुराई नज़र आती है (शहद भी विष-स्वरुप लगता है)। तात्पर्य है कि मेरा अस्तित्व और आदित्व (वजूद और अदम) दोनों समान हैं। और तेरी हालत यह है कि तेरा दिल जो वास्तव में हरम अर्थात काबा था, वो कुफ़्र का ग़ुलाम हो चुका है और तूने अपने ईमान को बेच डाला है।
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सम: ज़हर अथवा विष। बूद: हस्ती, अस्तित्व, व्यक्तित्व। हमनफ़स-ए-अदम: अर्थात मेरा होना न होना दोनों बराबर हैं। गरव-ए-अजम: ग़ैर-इस्लामी विचारों में घिरा हुआ।
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दम-ए-ज़िन्दगी, रम-ए-ज़िन्दगी, ग़म-ए-ज़िन्दगी, सम-ए-ज़िन्दगी
ग़म-ए-रम न कर, सम-ए-ग़म न खा क: यही है शान-ए-क़लन्दरी।

आगे इक़बाल कहते हैं कि जीवन की हर साँस (दम) आयु को कम कर देती है। जीवन के इस गुज़र जाने पर ग़म नहीं करना चाहिए क्यूँकि यह ग़म जीवन में ज़हर के समान है। अत: मुसलमान को चाहिए कि वह बीतती ज़िन्दगी का ग़म न करे और ग़म के इस ज़हर को न पिए। चाहिए कि ईश्वर की मर्ज़ी के आगे नतमस्तक हो जाये। यही सच्चे मोमिन जीवन होता है
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दम-ए-ज़िन्दगी, रम-ए-ज़िन्दगी: अर्थात हर साँस उम्र को कम कर देती है। क़लन्दरी: सच्चे मोमिन का जीवन यापन का तरीक़ा।  
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तेरी ख़ाक में है अगर शरर तो ख़्याल-ए-फ़क़्र-ओ-ग़ना न कर
क: जहाँ में नान-ए-शईर पर है मदार-ए-क़ुव्वत-ए-हैदरी।

ऐ मुसलमान! अगर तेरे दिल में इश्क़-ए-मुहम्मद (सल.) की चिंगारी मौजूद है तो यह परवाह मत कर कि तू ग़रीब है या अमीर है क्यूंकि नैसर्गिक और लौकिक कामयाबी के लिए दौलत ज़रूरी नहीं। क्या तुझे इल्म नहीं कि निस्बत-ए-मुहम्मद (हज़रत मुहम्मद से ताल्लुक़) के कारण ही हज़रत अली की अद्वितीय शक्ति अस्तित्व में आती है; जबकि वह जीवन भर जौ की रोटी खाकर फ़क्र का जीवन व्यतीत करते रहे। "जब इश्क़ सिखाता है" में अल्लामा इसी बात को इस तरह कहते हैं:
दारा-ओ-सिकन्दर से वो मर्द-ए-फ़क़ीर ऊला 
हो जिसकी फ़क़ीरी में बू-ए-असदुल्लाही।
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ख़ाक: अर्थात ख़ुदी, चरित्र अथवा मानव का दैवीय तत्व। फ़क़्र-ओ-ग़ना: ग़रीबी और अमीरी। शरर: अर्थात इश्क़-ए-रसूल (सल.) नान-ए-शईर: जौ की रोटी।
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कोई ऐसी तर्ज़-ए-तवाफ़ तू मुझे ऐ चराग़-ए-हरम बता
क: तेरे पतंग को फिर अता हो वही सरिश्त-ए-समन्दरी।

ऐ क़ौम के रहनुमाओं! मुसलमानों को ऐसी ज़िन्दगी बसर करने की दिशा दो कि उनके दिल में इश्क़-ए-रसूल की आग भड़कने लगे और वो स्वयं को इस इश्क़ की आग में मिटाने वाले बन जाएँ।
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तर्ज़-ए-तवाफ़: काबे के इर्द-गिर्द परिभ्रमण करने का तरीका, सन्दर्भ- इस्लामी ज़िन्दगी। चिराग़-ए-हरम: मुस्लिम उम्मत के मार्गदर्शक (रहनुमा-ए-क़ौम) पतंग: मुसलमान के सन्दर्भ में प्रयुक्त। सरिश्त-ए-समन्दरी: समन्दर का वह कीड़ा जो आग में रहता है। यहाँ इसका अर्थ आतिश मिज़ाजी से लिया गया है।
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गिला-ए-जफ़ा-ए-वफ़ानुमा क: हरम को अहले-हरम से है
किसी बुतकदे में बयाँ करूँ तो कहे सनम भी 'हरि-हरि'।

आगे इक़बाल कहते हैं कि ऐ मुसलमानों! तुम ने इस्लाम के साथ ऐसी बेवफ़ाई की है कि बज़ाहिर वो वफ़ा है लेकिन वास्तव में वो जफ़ा है। ज़ुबान से तौहीद का दावा है लेकिन अमल से बिलकुल विपरीत और उल्टा है। तुम्हारी इस दोग़ली नीति ने इस्लाम और अक़ीदा-ए-तौहीद-ओ-रिसालत को वो नुक़सान पहुँचाया है कि यदि में किसी बुतख़ाने में उसको बयान करूँ तो वहाँ के पत्थर के बने बुत भी लजा जाएँ (शरमा जाएँ) और उसको बुरा जानकर 'हरि-हरि' कहने लगे (अर्थात तौबा करने लगें )। 
इसका दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है कि अगर बुतों से अल्लाह के उन एहसानों के बारे में कहा जाये जो इस्लाम के ज़रिए मुसलमानों पर किये गए तो वो भी अल्लाह पर 'हरि-हरि' कहकर ईमान ले आएँ।
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गिला: शिकवा करना, शिकायत। जफ़ा-ए-वफ़ानुमा: ऐसी बेवफ़ाई जो देखने में वफ़ा नज़र आए। हरम: काबा; यहाँ दीन इस्लाम मुराद है। अहले-हरम: मुसलमान हरि: देवता विष्णु।
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न सतीज़ागाहे जहाँ नई न हरीफ़े पंजाफ़िगन नए
वही फ़ितरत-ए-असदुल्लही वही मरहबी वही अन्तरी।

इक़बाल कहते हैं कि ऐ मुसलमानों! अगर मौजूदा ज़माने में विरोधी ताक़तें इस्लाम के ख़िलाफ़ सर चढ़ कर बोल रही हैं तो यह कोई नयी बात नहीं है ! ज़रा इस्लाम की तारीख़ उठाकर तो देखो ! क्या हज़रत अली के विरुद्ध मरहब और उसका भाई अन्तर नहीं आया था !! इसलिए ग़मज़दा मत रहो। जिस तरह 'इश्क़-ए-रसूल' की बदौलत मौला अली अपने ज़माने के विरोधियों पर अजय थे, तुम भी हो सकते हो।
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सतीज़ागाह: मैदान-ए-जंग। हरीफ़े पंजाफ़िगन: ज़बरदस्त दुश्मन, घनिष्ठ शत्रु। फ़ितरत-ए-असदुल्लही: हज़रत अली अलैहिस्सलाम की सीरत। हज़रत अली इस्लाम के रक्षक और वकील हैं और असदुल्लाह (अल्लाह का शेर) उनका लक़ब है। मरहबी: मरहब से सम्बन्धित; मरहब ख़ैबर के क़िले के दरवाज़े का रक्षक पहलवान था और अत्यन्त शक्तिशाली था जिसे हज़रत अली ने परास्त किया अन्तरी: पहलवान मरहब का भाई पहलवान अन्तर जिसे हज़रत अली ने परास्त किया।

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करम ऐ शहे अरब-ओ-अजम क: खड़े हैं मुन्तज़िर-ए-करम
वो गदा क: तूने अता किया है जिन्हें दिमाग़-ए-सिकन्दरी।

इस शेर में अल्लामा इक़बाल सरवरे आलम (सल.) से दरख़्वास्त करते हैं कि आक़ा-ए-कायनात ! ऐ सरवर-ए-मौजूदात ! इस वक़्त आपकी निगाहे करम दरकार है। आपके दरवाज़े पर लोग आपके करम, दया और करूणा की भीख मांग रहे हैं। ये सब आपके वो ग़ुलाम हैं जिन्हें आपने सिकन्दर समान  विवेक प्रदान किया है।
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शाहे अरब-ओ-अजम: हज़रत मुहम्मद सल. मुन्तज़िर: इन्तेज़ार करने वाला। करम: अनुकम्पा, दया 
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ज़िया मुहीउद्दीन की आवाज़ में सुनें: