बाल-ए-जिबरील

[Bal-e-Jibreel][bleft]

बांग-ए-दरा

[Bang-e-Dra][bleft]

ज़र्ब-ए-कलीम

[Zarb-e-Kaleem][bleft]

Mazhab | मज़हब


अपनी मिल्लत पर क़यास अक़वाम-ए-मग़रिब से न कर
ख़ास है तरकीब में क़ौम-ए-रसूल-ए-हाशमी। 

उनकी जम'ईयत का है मुल्क-ओ-नसब पर इन्हेसार
क़ुव्वत-ए-मज़हब से मुस्तहकम है जम'ईय्यत  तिरी। 

दामन-ए-दीं हाथ से छूटा तो जम'ईय्यत कहाँ
और जम'ईय्यत हुई रुख़सत तो मिल्लत भी गयी। 
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व्याख्या:

इस नज़्म में अल्लामा इक़बाल ने मिल्लत (बंधुत्व), क़ौम, मुल्क इत्यादि शब्दों के मतलब को समझाया है। साथ ही, बताया है कि "मज़हब" किस तरह मिल्लत के लिए परम-आवश्यक है। इक़बाल ने मुसलमानों को एक होने की सलाह दी है। एकता किसी भी संस्था या तन्त्र की ज़िन्दगी के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता है। पुरानी कहावत है, 'एकता में ही शक्ति है', अत: इस शक्ति को बनाए रखने पर अल्लामा मुस्लिम क़ौम को प्रेरित कर रहे हैं और फ़रमाते हैं कि मुसलमान पश्चिमी जगत की अंधे होकर पैरवी न करने लग जाएँ। 

इक़बाल ने मुसलमानों पर ज़ाहिर किया है कि इस्लाम दुनिया में निराला दीन है। इसलिए ऐ मुसलमानों! तुम क़ौमियत का उसूल पश्चिम दुनिया से मत सीखो क्योंकि उनके यहाँ एक क़ौम का निर्माण भूखण्ड, वतन, नस्ल, रंग, भाषा इत्यादि के अनुसार होता है। लेकिन अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद (सल.) ने इन मानवनिर्मित पैमानों को मिटाकर तुम्हारी क़ौमियत का दारोमदार अक़ीदा-ए-तौहीद अर्थात इस्लाम पर रखा है। दुनिया भर में मुसलमान कहीं भी रहे, कोई भी ज़ुबान बोले, वह एक ही क़ौम का हिस्सा है क्योंकि वह एक दीन को मानता है। 

मज़हब की शक्ति से तुम्हारी अखण्डता और संगठन (जम'ईय्यत) का आधार है। यदि मज़हब हाथ से छूट गया तो तो संगठन बिखर जायेगा, फिर जब संगठन बिखर गया तो कैसी मिल्लत, कैसा बंधुत्व !!

नोट:
हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (सल.) ने फ़रमाया कि मैं अपने बाद मुसलमानों के लिए दो चीज़े छोड़ कर जा रहा हूँ। अगर इन दोनों का दामन मज़बूती से थामे रखोगे तो कभी गुमराह न होगे, पहली, अल्लाह की किताब (क़ुरआन) दूसरी मेरी अहलेबैत (और सुन्नत)। हुज़ूर के इस फ़रमान के बाद यदि मुसलमान क़ौम के कुछ लोग ख़ुद को बरेलवी, देवबन्दी, सल्फी, वहाबी जैसे ग़ैर-इस्लामी नामों से दुनिया के सामने पेश करते है तो यह पूरी क़ौम के लिए ज़िल्लत का सबब है!! अल्लामा ने कहा: "एक हों मुस्लिम हरम की पासबानी के लिए"। 
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