बाल-ए-जिबरील

[Bal-e-Jibreel][bleft]

बांग-ए-दरा

[Bang-e-Dra][bleft]

ज़र्ब-ए-कलीम

[Zarb-e-Kaleem][bleft]

Nigahe Faqr Me Shane Sikandari Kya Hai | निगाहे फ़क़्र में शान-ए-सिकन्दरी क्या है



निगाहे फ़क़्र में शान-ए-सिकन्दरी क्या है
ख़िराज की जो गदा हो वो क़ैसरी क्या है।

बुतों से तुझ को उमीदें ख़ुदा से ना-उम्मीदी
मुझे बता तो सही और काफ़िरी क्या है।

फ़लक ने उनको अता की है ख़्वाजगी क: जिन्हें
ख़बर नहीं रविश-ए-बन्दा परवरी क्या है।

फ़क़त निगाह से होता है फ़ैसला दिल का
न हो निगाह में शोख़ी तो दिलबरी क्या है।

इसी ख़ता से इताब-ए-मलूक है मुझ पर
क: जानता हूँ माल-ए-सिकन्दरी क्या है।

किसे नहीं है तमन्ना-ए-सरवरी लेकिन
ख़ुदी की मौत हो जिस में वो सरवरी क्या है।

ख़ुश आ गयी है जहाँ को क़लन्दरी मेरी
वगरना शेर मेरा क्या है, शायरी क्या है।
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व्याख्या:

निगाहे फ़क़्र में शान-ए-सिकन्दरी क्या है
ख़िराज की जो गदा हो वो क़ैसरी क्या है।

कोई भी बादशाह अपनी बादशाहत क़ायम और ज़िंदा रखने के लिए टैक्स, फ़ौज, राजकोष (ख़ज़ाना) इत्यादि का मोहताज बना रहता है। ये सभी चीज़ें उसकी सत्ता के लिए अपरिहार्य है जिनके बिना उसकी सत्ता बाक़ी नहीं रह सकती। लेकिन एक फ़क़ीर इन में से किसी चीज़ का मोहताज नहीं और उसके बावजूद भी दुनिया और दुनिया वालों पर हुकूमत करता है। इसलिए फ़क़ीर की निगाह में बादशाहत की प्रतिष्ठा का कोई मोल नहीं। फ़क़ीर केवल अल्लाह से सम्बन्ध रखता है और हर चीज़ उसी से माँगता है जबकि एक बादशाह की दौलत उसकी प्रजा से टैक्स के बदौलत मिलती है। दूसरों के माल से प्राप्त की गयी मालदारी भला किस काम की !
नोट: फ़क़ीर और भिखारी में उतना ही अन्तर है जितना ज़मीन और आसमान में है। एक फ़क़ीर किसी के आगे हाथ नहीं फैलाता !!
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निगाहे फ़क़्र:  फ़क़ीर की निगाह में शान-ए-सिकन्दरी: बादशाहत का मान-सम्मान; ख़िराज: कर, टैक्स क़ैसरी: मालदारी, अमीरी 
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बुतों से तुझ को उमीदें ख़ुदा से ना-उम्मीदी
मुझे बता तो सही और काफ़िरी क्या है।

यदि कोई व्यक्ति अल्लाह तआला से न माँगकर दुनिया वालों से मांगता है, उनके आगे हाथ फैलाता है तो वह व्यक्ति काफ़िर है क्यूँकि वह अल्लाह से ख़ुद को ना-उम्मीद कर चुका है और ना-उम्मीदी इस्लाम में कुफ़्र है।
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बुत: मूर्ति उमीदें: आशायें ना-उम्मीदी: निराशा काफ़िरी: ईश्वर की सृष्टि को ईश्वर का दर्जा देना। 
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फ़लक ने उनको अता की है ख़्वाजगी क: जिन्हें
ख़बर नहीं रविश-ए-बन्दा परवरी क्या है।

इस शेर में इक़बाल ने बादशाहों के व्यवहार की आलोचना की हैं। कहते हैं कि अक्सर देखा जाता है कि बादशाह अपनी मर्ज़ी के अनुसार उन लोगों को बड़ी-बड़ी ज़िम्मेदारियाँ सौंप देते हैं जो बिल्कुल भी उस ज़िम्मेदारी के क़ाबिल नहीं है। बड़े-बड़े पद चापलूसों और मौकापरस्तों को दे दिए जाते हैं जो यह नहीं जानते के ज़िम्मेदारी निभाने के तौर-तरीक़े क्या हैं! इसके विपरीत जो लोग दक्ष और स्वाभिमानी (Competent and Confident) होते हैं वो "जी-हुज़ूरी" और चापलूसी से दूर रहते हैं। 
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फ़लक: फ़लक का अर्थ आकाश होता है किन्तु यहाँ यह बादशाही फ़रमान को दर्शाता है; अता: प्रदान करना, देना; ख़्वाजगी: सरदारी, अधिकार; रविश: तौर-तरीक़ा; बन्दा परवरी: ज़िम्मेदारी 
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फ़क़त निगाह से होता है फ़ैसला दिल का
न हो निगाह में शोख़ी तो दिलबरी क्या है।

किसी व्यक्ति का दिल कैसा है, उसमे कितना आकर्षण है-यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसका नज़रिया कितना आकर्षक है अर्थात वो चीज़ो को किस दृष्टि से देखता है? अल्लाह और उसकी सृष्टि के प्रति उसका क्या रवैया है? यदि उसके प्रत्यक्ष (अर्थात दृष्टि) में आकर्षण नहीं तो उसके भीतर (मन) पर विश्वास कैसा?
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फ़क़त: केवल, सिर्फ़ निगाह: दृष्टि, नज़रिया शोख़ी: आकर्षण दिलबरी: मनमोहकता
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इसी ख़ता से इताब-ए-मलूक है मुझ पर
क: जानता हूँ माल-ए-सिकन्दरी क्या है।

अल्लामा इक़बाल कहते हैं कि ये तख़्तो ताज, हुकूमत, सल्तनत, प्रतिष्ठा, खज़ाना, धन-दौलत, ठाठ-बाट इत्यादि सब कुछ क्षणभंगुर हैं इसलिए इन सब पर घमण्ड करना व्यर्थ है। बादशाह चले जाते हैं और उनका माल-दौलत और प्रतिष्ठा इसी दुनिया में रह जाती है। इसीलिए इस पर घमंड करना व्यर्थ है। इक़बाल कहते हैं कि मेरी इतनी सी बात पर राजा-महाराजा मुझसे नाराज़ हैं और मुझ पर क्रोधित हैं।
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ख़ता: ग़लती इताब: क्रोध मलूक: राजा-महाराजा से सम्बद्ध माल-ए-सिकन्दरी: बादशाहों की सम्पत्ति
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किसे नहीं है तमन्ना-ए-सरवरी लेकिन
ख़ुदी की मौत हो जिस में वो सरवरी क्या है।

यह इन्सान की फ़ितरत है कि उसे सरदारी और हुकूमत की ख़्वाहिश रहती है और वह तमन्ना करता है कि दूसरों पर हुकूमत करे, लोग उसके आगे सर झुकाएँ और उसकी आव-भगत करें। लेकिन वास्तविकता यह कि अपनी इन तमन्नाओं की पूर्ती के लिए वह अपने ज़मीर का सौदा कर बैठता है और अपनी ख़ुदी भी बेच डालता है जैसा कि इतिहास में मीर जाफ़र और मीर सादिक़ जैसे ग़द्दारों की मिसाल मिलती है। अल्लामा इक़बाल का फ़ारसी शेर:
जाफ़र अज़ बंगाल व सादिक़ अज़ दकन
नंग-ए-आदम, नंग-ए-दीं, नंग-ए-वतन। 
इक़बाल कहते हैं कि ऐसी सरवरी का क्या फ़ायदा जो ज़मीर से ख़ारिज हो।
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सरवरी: सरदारी, सत्ता की इच्छा
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ख़ुश आ गयी है जहाँ को क़लन्दरी मेरी
वगरना शेर मेरा क्या है, शायरी क्या है। 

इक़बाल कहते हैं कि लोगों को मेरा कलाम इस लिए पसन्द है क्यूंकी मैं क़लन्दराना ज़िन्दगी बसर करता हूँ और अपनी क़ौम को अल्लाह और उसके रसूल हज़रत मुहम्मद (सल.) का पैग़ाम सुनाता हूँ। लोग इस को पसन्द करते हैं वरना मेरे शेर में तो कोई ख़ास बात नहीं। दुनिया में बहुत बड़े-बड़े शायर हैं जिनके कलाम लाजवाब हैं। मुझे जो इज़्ज़त नसीब हुई है वो इस लिए नहीं कि मैं शायर हूँ बल्कि इस लिए कि मैं अपनी क़ौम का ग़मख़्वार हूँ और उसको इश्क़-ए-रसूल (सल.) का दर्स देता हूँ।
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