बाल-ए-जिबरील

[Bal-e-Jibreel][bleft]

बांग-ए-दरा

[Bang-e-Dra][bleft]

ज़र्ब-ए-कलीम

[Zarb-e-Kaleem][bleft]

Siddeeq | सिद्दीक़



इक दिन रसूल-ए-पाक ने असहाब से कहा
दें माल राह-ए-हक़ में जो हों तुम में मालदार।

इरशाद सुन के फ़र्त-ए-तरब से उमर उठे
उस रोज़ उनके पास थे दिरहम कई हज़ार।

दिल में यह कह रहे थे क: सिद्दीक़ से ज़रूर
बढ़ कर रखेगा आज क़दम मेरा राहवार।

लाए ग़रज़ क: माल रसूल-ए-अमीं के पास
ईसार की है दस्त-ए-निगर इब्तिदा-ए-कार।

पूछा हुज़ूर सरवर-ए-आलम ने, ऐ उमर !
ऐ वो क: जोश-ए-हक़ से तेरे दिल को है क़रार।

रखा है कुछ अयाल की ख़ातिर भी तूने क्या?
मुस्लिम है अपने खुवेश-ओ-अक़ारिब का हक़ गुज़ार।

की अर्ज़, निस्फ़ माल है फ़र्ज़न्द-ओ-ज़न का हक़
बाक़ी जो है वो मिल्लत-ए-बैज़ा पे है निसार।

इतने में वो रफ़ीक़-ए-नबुव्वत भी आ गया
जिससे बिना-ए-इश्क़-ओ-मुहब्बत है उस्तवार।

ले आया अपने साथ वो मर्द-ए-वफ़ा सरिश्त
हर चीज़ जिससे चश्म-ए-जहाँ में हो ऐतबार।

मिल्क-ए-यमन-ओ-दिरहम-ओ-दीनार-ओ-रख्त-ओ-जिन्स
इस्प-ए-कमरसुम-ओ-शुतर-ओ-क़ातिर-ओ-हिमार।

बोले हुज़ूर चाहिए फ़िक्र-ए-अयाल भी
कहने लगा वो इश्क़-ओ-मुहब्बत का राज़दार।

ऐ तुझ से दीदा-ए-माह-ओ-अन्जुम फ़रोग़-गीर
ऐ तेरी ज़ात बाइस-ए-तक़वीन-ए-रोज़गार।

परवाने को चिराग़ है, बुलबुल को फूल बस
सिद्दीक़ के लिए है ख़ुदा का रसूल बस।
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व्याख्या:

यह नज़्म अल्लामा इक़बाल ने हुज़ूर हज़रत मुहम्मद (सल.) के प्रथम ख़लीफ़ा हज़रत अबु-बक्र 'सिद्दीक़' (रज़ि) की स्तुति में लिखी है (सिद्दीक़: The Truthful)। हज़रत अबु-बक्र सिद्दीक़ (रज़ि) को "यार-ए-ग़ार" भी कहा जाता है क्योंकि वो हज़रत मुहम्मद (सल.) के साथ ग़ार-ए-सौर (ग़ार: गुफ़ा) में आपके साथ रहे जिसका ज़िक्र क़ुरान में "सानी असनैन इज़ हुमा फ़िल ग़ार" [अर्थात ग़ार में मौजूद उन दो लोगों में दूसरे] के रूप में आया।
अबु-बक्र सिद्दीक़, बक़ौल हुज़ूर हज़रत  मुहम्मद (सल.), दीन इस्लाम में राजनैतिक संप्रभुता (Political Sovereignty ) के स्रोत हैं और अल्लाह के नबियों के बाद इन्सानों में सबसे बेहतर और सबसे पहले हैं। अल्लामा इक़बाल ने हज़रत सिद्दीक़ के बारे में पंजतन पाक (मुहम्मद, अली, फ़ात्मा, हसन, हुसैन अलैहिमुस्सलाम) की तुलना में कम लिखा है लेकिन जो भी लिखा है वो उच्चकोटि का है और मोमिन के अक़ीदे का अहम हिस्सा है
प्रस्तुत नज़्म में हज़रत सिद्दीक़-ए-अकबर की हुज़ूर(सल.) के प्रति वफ़ादारी, इश्क़ और जाँनिसारी की एक छोटी झलक दिखाई गयी है। हुज़ूर(सल.) के साथियों की जाँनिसारी तो यह थी कि अपनी जान भी हुज़ूर(सल.) के सुपुर्द करते थे जैसा कि एक बार दूसरे ख़लीफ़ा हज़रत उमर (रज़ि) ने कहा-"हुज़ूर! मेरा ईमान तब मुकम्मल हुआ जब मैं आपको अपनी जान ज़्यादा चाहने लगा'
प्रस्तुत नज़्म का सम्बन्ध 9 हिजरी में हुई जंग-ए-तबूक से है जबकि हज़रत मुहम्मद (सल.) ने अपने साथियों से अल्लाह के दीन के लिए अपनी सम्पत्ति दान करने का हुक्म दिया। हज़रत उसमान (जो हुज़ूर के तीसरे ख़लीफ़ा हुए) ने बहुत ज़्यादा सम्पत्ति हुज़ूर के क़दमों पर डाल दी। हज़रत उमर ने अपनी आधी सम्पत्ति हुज़ूर को पेश की और आधी अपने परिवार के लिए बचा कर रखी जिसका हज़रत उमर पर हक़ बनता था। फिर हज़रत अबु-बक्र ने जो पेशकश की, उसी इश्क़ की दास्ताँ को इक़बाल इस तरह लिखते हैं:

इक दिन रसूल-ए-पाक ने असहाब से कहा
दें माल राह-ए-हक़ में जो हों तुम में मालदार।

एक दिन हज़रत मुहम्मद (सल.) ने अपने साथियों को हुक्म दिया कि आप लोगों में जो आर्थिक तौर पर मज़बूत हैं उन्हें चाहिए कि वे अल्लाह की राह में अपनी सम्पत्ति भेंट करें।
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रसूल-ए-पाक: हज़रत मुहम्मद (सल.) जो अल्लाह के रसूल (संदेष्टा) हैं। असहाब: हज़रत मुहम्मद (सल.) के ऐसे अनुयायी जिन्होंने हज़रत मुहम्मद (सल.) को ईमान की हालत में देखा और देह-अवसान (Death) तक ईमान पर रहे। माल: सम्पत्ति राह-ए-हक़: अल्लाह की राह में मालदार: अमीर। 
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इरशाद सुन के फ़र्त-ए-तरब से उमर उठे
उस रोज़ उनके पास थे दिरहम कई हज़ार।

हुज़ूर की यह बात सुनकर हज़रत उमर ख़ुशी के साथ उनकी आज्ञा का पालन करने के लिए उठ पड़े। उस दिन उमर के पास कई हज़ार दिरहम थे।
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इरशाद: आदेश, वचन, कोई बात कहना फ़र्त-ए-तरब: ख़ुशी के मारे उमर: ख़लीफ़ा हज़रत उमर इब्ने ख़त्ताब (रज़ि.) दिरहम: चाँदी की हुई मुद्रा (Currency) जो उस समय प्रचलित थी।
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दिल में यह कह रहे थे क: सिद्दीक़ से ज़रूर
बढ़ कर रखेगा आज क़दम मेरा राहवार।

हुज़ूर के साथियों/ चाहने वालों के इश्क़ की मिसालें दुनिया में कहीं नहीं पायी जातीं। होड़ रहती थी कि कौन हुज़ूर और उनके दीन की सेवा सबसे अधिक करे। चूँकि हज़रत अबु-बक्र सिद्दीक़ ने हुज़ूर पर बहुत एहसान किए थे इसलिए हज़रत उमर यह सोच रहे थे कि शायद मैं भी हज़रत सिद्दीक़-ए-अकबर की तरह अपनी मुहब्बतें हुज़ूर के सामने पेश करूँ।
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सिद्दीक़: ख़लीफ़ा हज़रत अबु-बक्र सिद्दीक़ (रज़ि) राहवार: घोड़ा।
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लाए ग़रज़ क: माल रसूल-ए-अमीं के पास
ईसार की है दस्त-ए-निगर इब्तिदा-ए-कार।

किसी बड़े काम की शुरुआत उसमें शामिल लोगों के त्याग और बलिदान की मोहताज होती है। इसी भावना के साथ हज़रत उमर अपना माल हुज़ूर (सल.) के पास ले आए।
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रसूल-ए-अमीं: अर्थात रसूल-ए-अमीन हज़रत मुहम्मद। हज़रत मुहम्मद को "अमीन" लक़ब नबुव्वत के ऐलान से पहले अरब की जनता ने दिया था क्यूकी आप सबकी अमानतों की रक्षा करने वाले थे। ईसार: त्याग की भावना जिसके तहत मनुष्य अपने फ़ायदे की न सोचकर दूसरों के फ़ायदे की सोचता है। दस्त-ए-निगर: मोहताज या पाबन्द होना इब्तिदा-ए-कार: काम की शुरुआत।
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पूछा हुज़ूर सरवर-ए-आलम ने, ऐ उमर !
ऐ वो क: जोश-ए-हक़ से तेरे दिल को है क़रार।
रखा है कुछ अयाल की ख़ातिर भी तूने क्या?
मुस्लिम है अपने खुवेश-ओ-अक़ारिब का हक़ गुज़ार।

यह देखकर हुज़ूर ने हज़रत उमर से कहा कि ऐ दिल में इश्क़ का जोश रखने वाले ! क्या तुमने कुछ माल अपने परिवार और रिश्तेदारों के जीवन-यापन (गुज़ारे) के लिए रखा है या नहीं ? एक मुसलमान को चाहिए कि वो सबको सबका हक़ दे।
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हुज़ूर सरवर-ए-आलम: हज़रत मुहम्मद (सल) अर्थात पृथ्वी लोक के स्वामी/ सरदार जोश-ए-हक़: अल्लाह और रसूल की मुहब्बत का जोश क़रार: सुकून, चैन अयाल की ख़ातिर: परिवार के लिए, बाल-बच्चों के लिए खुवेश: रिश्तेदार अक़ारिब: रिश्ते में क़रीबी लोग, परिवारजन हक़-गुज़ार: हक़ अदा करने वाला। 
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की अर्ज़, निस्फ़ माल है फ़र्ज़न्द-ओ-ज़न का हक़
बाक़ी जो है वो मिल्लत-ए-बैज़ा पे है निसार।

इस पर हज़रत उमर ने सम्मानपूर्वक हुज़ूर से कहा कि आधा माल अपने बीवी-बच्चों के लिए रख छोड़ा है और आधी सम्पत्ति रौशन रसूल की रौशन उम्मत की सेवा में समर्पित है।
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अर्ज़ करना: बात कहना, बोलना निस्फ़: आधा फ़र्ज़न्द: बेटा ज़न: बीवी बाक़ी: शेष, बचा हुआ मिल्लत-ए-बैज़ा: रोशन मिल्लत निसार: क़ुर्बान, निछावर।
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इतने में वो रफ़ीक़-ए-नबुव्वत भी आ गया
जिससे बिना-ए-इश्क़-ओ-मुहब्बत है उस्तवार।

हज़रत अबु-बक्र सिद्दीक़ की तरफ इशारा करते हुए अल्लामा कहते हैं कि इतने में हुज़ूर के आशिक़ हज़रत सिद्दीक़ भी आ गए। अबु-बक्र सिद्दीक़ वो हैं जिनसे इश्क़ और स्नेह अपने उत्कर्ष (Ultimate Point) को पहुँचता और अपनी बुनियाद में मज़बूत होता है। 
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रफ़ीक़: दोस्त बिना: जड़, स्रोत, अस्तित्व, आधार उस्तवार: मज़बूत, स्थिर, पायदार।
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ले आया अपने साथ वो मर्द-ए-वफ़ा सरिश्त
हर चीज़ जिससे चश्म-ए-जहाँ में हो ऐतबार।
मिल्क-ए-यमन-ओ-दिरहम-ओ-दीनार-ओ-रख्त-ओ-जिन्स
इस्प-ए-कमरसुम-ओ-शुतर-ओ-क़ातिर-ओ-हिमार।

हुज़ूर (सल.) की मुहब्बत में फ़ना होने वाले हज़रत सिद्दीक़ हर वो चीज़ हुज़ूर (सल.) की सेवा में ले आए जो दुनिया की नज़र में किसी काम की होती है और कुछ मान (Value) रखती है। जैसे कि: सेवक, सेविकाएँ, धन, दौलत, आम जीवन यापन का सामान, घोड़े, ऊँट, ख़च्चर, गधे इत्यादि।
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मर्द-ए-वफ़ा सरिश्त: हज़रत मुहम्मद (सल.) के इश्क़ में गुणी या ख़ूबी वाला चश्म-ए-जहाँ: दुनिया की नज़र में ऐतबार: प्रतिष्ठित, इज़्ज़तदार मिल्क-ए-यमन: इसका तात्पर्य उस ख़ादिम (सेवक) से है जिसका दाहिना हाथ उसका सरदार हो अर्थात वह अपने मालिक का बहुत सम्मान करता हो। दिरहम-ओ-दीनार: मुद्राएँ, करेंसी रख्त-ओ-जिन्स: साज़-ओ-सामान, ज़रूरी सामान इस्प-ए-कमरसुम: ऐसा घोड़ा जिसके खुर चाँदी की तरह ख़ूबसूरत हों शुतर: ऊँट क़ातिर: ख़च्चर हिमार: गधा।
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बोले हुज़ूर चाहिए फ़िक्र-ए-अयाल भी
कहने लगा वो इश्क़-ओ-मुहब्बत का राज़दार।
ऐ तुझ से दीदा-ए-माह-ओ-अन्जुम फ़रोग़-गीर
ऐ तेरी ज़ात बाइस-ए-तक़वीन-ए-रोज़गार।

अबु-बक्र की दरियादिली देखकर हुज़ूर ने वही सवाल उनसे भी किया जो हज़रत उमर से किया था कि परिवार के लिए कुछ छोड़ा या नहीं? इस पर हुज़ूर से सच्चे इश्क़ का सुबूत देते हुए हज़रते सिद्दीक़ ने फ़रमाया, "हुज़ूर! आप ही से चाँद-तारों को रौशनी मिलती है और इस कायनात (सृष्टि) का निर्माण आपकी ज़ात पाक के लिए ही हुआ है और चाँद-तारों-सूरज की गर्दिशें बस आपकी वजह से हैं।
इस बात को अल्लामा ने एक "हदीस-ए-क़ुदसी" से लिया है जिसमें अल्लाह फ़रमाता है कि ऐ मुहम्मद ! अगर मैं तुम्हें पैदा न तो इस कायनात को भी न बनाता"।
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फ़िक्र-ए-अयाल: परिवार की चिन्ता। माह: चाँद अन्जुम: सितारे बाइस: वजह, सबब तक़वीन: निर्माण करना रोज़गार: ब्रह्माण्ड के क्रिया चक्र।
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परवाने को चिराग़ है, बुलबुल को फूल बस
सिद्दीक़ के लिए है ख़ुदा का रसूल बस।

हुज़ूरे अनवर (सल.) ! जिस तरह परवाना सिर्फ़ चिराग़ की शमा पर मिटना जनता है और बुलबुल सिर्फ़ गुल के लिए जीता-मरता है, मैं भी सिर्फ़ आप पर अपना सभी कुछ निछावर करता हूँ। फिर रही बात मेरे अहलो-अयाल की, तो आप सबको ज़िन्दगियाँ देते हैं, जीवन की ऊर्जा देते हैं इसलिए अबु-बक्र के लिए सिर्फ़ ख़ुदा का रसूल ही काफी है।
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