बाल-ए-जिबरील

[Bal-e-Jibreel][bleft]

बांग-ए-दरा

[Bang-e-Dra][bleft]

ज़र्ब-ए-कलीम

[Zarb-e-Kaleem][bleft]

Subah | सुबह



यह सहर जो कभी फ़रदा है कभी है इमरोज़
नहीं मालूम क: होती है कहाँ से पैदा
वो सहर जिस से लरज़ता है शबिस्तान-ए-वुजूद
होती है बन्दा-ए-मोमिन की अज़ाँ से पैदा। 
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व्याख्या:

यह कलाम इक़बाल के उर्दू संग्रह 'ज़र्ब-ए-कलीम' के प्रथम हिस्से से लिया गया है। इस नज़्म में अल्लामा इक़बाल ने दो तरह की सुबह का ज़िक्र किया है। पहली वो जो पृथ्वी की अपनी धुरी पर घूमने से होती है। और दूसरी उस सुबह का ज़िक्र किया है जिस के ज़रिए इन्सान के दिल में अपने रब पर ईमान लाने का इन्क़लाब बरपा होता है, उसका यक़ीन रब पर और ज़्यादा पुख़्ता होता है और वो अँधेरों से निकालकर रोशनी में आता है। 
इक़बाल फ़रमाते हैं कि यह सुबह जिस से कल का दिन गुज़रता है और आज का दिन आता है, यानि दिन-रात का अपना चक्र वजूद में आता है, मालूम नहीं कहाँ से पैदा होती है। यहाँ इक़बाल 'आरिफ़ाना' अन्दाज़ में इस बात को शेर में पिरो रहे हैं, हालाँकि क़ुरआन, वेद, दूसरी आसमानी किताबों और अब विज्ञान के ज़रिए दुनिया जानती है कि यह पृथ्वी के गतिमान होने की वजह से होता है। यह तो पता नही कि यह सुबह कहाँ से आती है लेकिन इतना ज़रूर पता है कि वो सहर जिस से बातिल, असत्य और शैतानियत काँप जाती है, वो तो एक मोमिन द्वारा अज़ान की सदा बुलन्द करने से पैदा होती है। जब सुबह में नारा-ए-तकबीर अज़ान की शक्ल में गूँजता है तो इक इन्क़लाब बरपा हो जाता है।

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फ़रदा: आने वाला कल, इमरोज़: आज का दिन, सहर: सुबह, लरज़ना: कम्पन्न करना, हिलना, शबिस्तान-ए-वुजूद: अँधेरी जगह, अज़ाँ: अज़ान