बाल-ए-जिबरील

[Bal-e-Jibreel][bleft]

बांग-ए-दरा

[Bang-e-Dra][bleft]

ज़र्ब-ए-कलीम

[Zarb-e-Kaleem][bleft]

Qataa | क़तआ


फ़ितरत मिरी मानिन्द-ए-नसीम-ए-सहरी है
रफ़्तार है मेरी कभी आहिस्ता कभी तेज़
पहनाता हूँ अतलस की क़बा लाला-ओ-गुल को
करता हूँ सरे ख़ार को सोज़न की तरह तेज़
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इस क़तआ का मतलब यह है कि एक वास्तविक और सच्चे शायर की तबियत और प्रवृति क़ुदरत और उसके उसूलों के अनुरूप होती है. वह सृष्टि को प्रकृति की दृष्टि से देखता है और कुदरत के मक़सद को पूरा करने हर प्रकार से मदद करता है. क़ुदरत का मक़सद सिर्फ़ दूसरों को फाएदा पहुँचाना होता है, इस तरह कायनात को ख़ूबसूरत बनाने में सच्चा शायर अपना जी-जान लगा देता है.
इस बात को समझाने के लिए अल्लामा इक़बाल ने नसीम (सुबह की हवा) की मिसाल दी है. कहते हैं कि मेरी प्रवृति नसीम की तरह है जो कभी तेज़ होती है तो कभी मन्द. इसलिए मेरी कुछ बातें नरम होती हैं तो कुछ बातें तेज़. उदाहरण के तौर पर जब में फूलों का ज़िक्र करता हूँ तो अपनी कल्पना शक्ति और शायरी के कौशल के बल पर उनको बहुत हसीं और मोहक बना देता हूँ.
और जब काँटों का ज़िक्र आता है तो उनको सुई की तरह तेज़ी दे देता हूँ. बस यही शायरी की कामयाबी है कि क़ुदरत के पहलुओं को वह और हसीन बना देती है.
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फ़ितरत: प्रकृति, नसीम-ए-सहरी: सुबह की हवा (Breeze), आहिस्ता: मन्द, अतलस की क़बा: रेशम के वस्त्र, ख़ार: काँटा