बाल-ए-जिबरील

[Bal-e-Jibreel][bleft]

बांग-ए-दरा

[Bang-e-Dra][bleft]

ज़र्ब-ए-कलीम

[Zarb-e-Kaleem][bleft]

Dil Soz Se Khali Hai | दिल सोज़ से ख़ाली है

दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है
फिर इस में अजब क्या क: तू बेबाक नहीं है.

है ज़ौक़-ए- तजल्ली भी इसी ख़ाक में पिन्हाँ
ग़ाफ़िल ! तू निरा साहिब-ए-इदराक नहीं है.

वो आँख क: है सुरमा-ए-अफ़रंग से रोशन
पुरकार-ओ-सुख़न साज़ है, नमनाक नहीं है.

क्या सूफ़ी-ओ-मुल्ला को ख़बर मेरे जुनूं की
उनका सरे दामन भी अभी चाक नहीं है.

कब तक रहे महकूमी-ए-अन्जुम में मेरी ख़ाक
या मैं नहीं, या गर्दिश-ए-अफ़लाक नहीं है.

बिजली हूँ, नज़र कोह-ओ-बयाबां पे है मेरी
मेरे लिए शायाँ ख़स-ओ-ख़ाशाक नहीं हैं.

आलम है फ़क़त मौमिन-ए-जाँबाज़ की मीरास
मौमिन नहीं जो साहिब-ए-लौलाक नहीं है !
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इस कलाम को उस्ताद राहत फ़तेह अली खान की आवाज़ में सुनें: