बाल-ए-जिबरील

[Bal-e-Jibreel][bleft]

बांग-ए-दरा

[Bang-e-Dra][bleft]

ज़र्ब-ए-कलीम

[Zarb-e-Kaleem][bleft]

Rubai | रूबाई


दिलों को मरकज़-ए-महर-ओ-वफ़ा कर 
हरीम-ए-किबरिया से आशना कर
जिसे नान-ए-जवीं बख्शी है तू ने 
उसे बाज़ू-ए-हैदर भी अता कर. 
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व्याख्या: 

इस रूबाई में अल्लामा इक़बाल ने अल्लाह से यह दुआ मांगी है कि ऐ ख़ुदा ! मुसलमानों के दिल में मुहब्बत और वफ़ा का रंग पैदा कर और उन्हें हरीम-ए-किबरिया से आशना कर दे. साथ ही उन्हें हज़रत मौला अली अलैहिस्सलाम के बाज़ुओं की कुव्वत भी अता कर. 

मुहब्बत: यहाँ मुहब्बत का मतलब मुसलमानों का "आपसी भाईचारा" है. अल्लामा की यह बात क़ुरान की उस आयत से प्रेरित है जिसमे अल्लाह ताअला ने फ़रमाया, "जनाब हज़रत मुहम्मद (सल.) अल्लाह के रसूल हैं और जो मोमिन लोग आपके साथ हैं उनकी विशेषता यह है कि वो बातिल के साथ बहुत सख्ती से पेश आते हैं और आपस में बहुत रहमदिल हैं." 

वफ़ा: यहाँ वफ़ा से मुराद है हज़रत मुहम्मद (सल) का इश्क़, उनसे और उनकी शरियत से जिन्दा ताल्लुक़ रखना. मुसलमानों में यदि 'आपसी मुहब्बत' और 'हुज़ूर से इश्क़' की दो ख़ूबियाँ पैदा हो जाएँ तो फिर और किसी चीज़ की क्या ज़रुरत ! यही वो सरमाया है जिस के आगे दुनिया भर की सल्तनत, दौलत सब बेकार है. 

हरीम-ए-किबरिया: हरीम-ए-किबरिया से आशनाई का मतलब है कि मुसलमान अपनी सारी जद्दो जहद, भाग-दौड़ और महनत-मशक्कत सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा हासिल करने के लिए अन्जाम दे. उसका एक ही मक़सद होना चाहिए- "ख़ुदा की रज़ा हासिल करना" जिस तरह हज़रत इमाम हुसैन कर्बला के मैदान में यज़ीद जैसे ज़ालिम के अनगिनत ज़ुल्म सहते रहे, उसको समझाते रहे कि वह नबी के दीन को तबाह करने से बाज़ आए. लेकिन वो बाज़ न आया और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अल्लाह की रज़ा और अपने नाना के दीन की खातिर सर क़ुर्बान कर दिया. 

नान-ए-जवीं: नान-ए-जवीं का मतलब है "जौ की रोटी". जौ की रोटी बहुत सख्त होती है और उसका ज़ायका गेहूँ की रोटी की तरह नहीं होता. जौ की रोटी ग़रीबी और परहेज़गारी की निशानी है. अल्लामा कहते हैं कि ऐ ख़ुदा ! जिस मोमिन को तूने ग़रीबी और परहेज़गारी दी है उसको हज़रत मौला अली शेर-ए-ख़ुदा (अलैहिस्सलाम) के बाज़ुओं की ताक़त अता फरमा और इस कौम को बहुत ज़्यादा ताक़तवर बना ताकि यह कौम दुनिया से बेइंसाफी का खात्मा कर दे और मौला अली की तरह न्याय को दुनिया में आम कर दे. याद रहे कि हज़रत अली का इन्साफ बे-मिसाल था. जब हज़रत उमर (रदि अल्लाहो अन्ह) ख़लीफ़ा-ए-वक़्त थे तो आप अक्सर फ़ैसले मौला अली से करवाया करते थे. मौला अली को सदाक़त और इन्साफपरस्ती की ताक़त अल्लाह ताला ने "इश्क़-ए-रसूल" से अता की. अल्लामा इक़बाल ने जौ की रोटी, और हज़रत अली की क़ुव्वत के सम्बन्ध से एक जगह नज़्म मैं और तू में फ़रमाया:

तेरी ख़ाक में है अगर शरर तो ख्याल-ए-फ़क़्र-ओ-ग़िना न कर 
क: जहाँ में नान-ए-शईर पर है मदार-ए-कुव्वत-ए-हैदरी !

अर्थात ऐ मुसलमान! अगर तेरे दिल में इश्क़-ए-मुहम्मद (सल.) की चिंगारी मौजूद है तो यह परवाह मत कर कि तू ग़रीब है या अमीर है क्यूंकि नैसर्गिक और लौकिक कामयाबी के लिए दौलत ज़रूरी नहीं। क्या तुझे इल्म नहीं कि निस्बत-ए-मुहम्मद (हज़रत मुहम्मद से ताल्लुक़) के कारण ही हज़रत अली की अद्वितीय शक्ति अस्तित्व में आती है; जबकि वह जीवन भर जौ की रोटी खाकर फ़क्र का जीवन व्यतीत करते रहे।
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