बाल-ए-जिबरील

[Bal-e-Jibreel][bleft]

बांग-ए-दरा

[Bang-e-Dra][bleft]

ज़र्ब-ए-कलीम

[Zarb-e-Kaleem][bleft]

Sama Sakta Nahi | समा सकता नहीं

आला हज़रत शहीद अमीरुल मोमिनीन नादिरशाह ग़ाज़ी (अलैह रहमा) के लुत्फ़-ओ-करम से नवम्बर 1933 को मुसन्निफ़ (अल्लामा इक़बाल) को हकीम सनाई ग़ज़नवी (अलैह रहमा) के मज़ार-ए-अक़दस की ज़ियारत नसीब हुई। ये चंद अफ़कार-ए-परेशाँ जिनमे हकीम ही के एक मशहूर क़सीदे की पैरवी की गयी है, और उस रोज़-ए-सईद की यादगार में सुपुर्द-ए-क़लम की गयी है: "मा अज़ पए सनाई-ओ-अत्तार आमदीम"

In November, 1933, His Majesty the Leader of the Faithful the now‐martyred Nadir Shah Ghazi granted the author permission to visit the shrine of The sage Sana‘i of Ghazna. These verses were written in commemoration of the event, in imitation of a famous panegyric by the poet—
‘We are coming after Sina‘i and Attar.’



समा सकता नहीं पहना-ए-फ़ितरत में मेरा सौदा 
ग़लत था ऐ जुनूँ शायद तेरा अंदाज़ा-ए-सहरा 
All Nature's Vastness cannot contain My Passion 
Perhaps, My fondness had wrongly estimated the dessert's size
*

ख़ुदी से इस तिलिस्म-ए-रंग-ओ-बू को तोड़ सकते हैं 
यही तौहीद थी जिसको न तू समझा न मैं समझा !
With the Power of Self, the magic of color and smell can be broken
That was the Real Faith which neither you understood nor I
*
निगह पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल तजल्ली ऐन-ए-फ़ितरत है 
क: अपनी मौज  से बेगाना रह सकता नहीं दरया !
Discover your vision O sluggish Man, Manifestation is exactly according to Nature
Because ocean cannot stay without its wave.   

रक़ाबत इल्म-ओ-इरफ़ां में ग़लतबीनी है मिम्बर की 
क: वो हल्लाज की सूली को समझा है रक़ीब अपना 
Rostrum (Ulemas) has wrongly perceived the rivalry of Knowledge and Wisdom
Because he thinks the Revelation (Mystic Hallaj on his cross) as his foe

ख़ुदा के पाक बन्दों को हुकूमत में, ग़ुलामी में 
ज़िरह कोई अगर महफ़ूज़ रखती है तो इस्तग़ना 
For God's pure Men, whether in Power or in slavery
Only safe shield is Independence

न कर तक़लीद ऐ जिबरील मेरे जज़्ब-ओ-मस्ती की 
तन आसाँ अर्शियों को ज़िक्र-ओ-तस्बीह-ओ-तवाफ़ औला 
O Gabrial do not follow my absorption and enthusiasm
For trouble free sky creatures, its better to do prayers, count beads and go round !

**********

बहुत देखे हैं मैंने मशरिक़-ओ-मग़रिब के मयख़ाने
यहाँ साक़ी नहीं पैदा, वहाँ बे-ज़ौक़ है सहबा !
I have seen many a wine‐shop East and West;
But here no Saki, there in the grape no glow.
  *

न ईरां में रहे बाक़ी, न तूरां में रहे बाक़ी
वो बन्दे, फ़क़्र था जिनका हलाक-ए-क़ैसर-ओ-किसरा
In Iran no more, in Tartary no more,
Those world‐renouncers who could overthrow
*

यही शैख़-ए-हरम है जो चुराकर बेच खाता है
गलीम-ए-बूज़र-ओ-दलक़-ए-अवैस-ओ-चादर-ए-ज़हरा
Great kings; the Prophet’s heir filches and sells
The blankets of the Prophet’s kin.
*

 हुज़ूरे हक़ में इस्राफ़ील ने मेरी शिकायत की
यह बन्दा वक़्त से पहले क़यामत कर न दे बरपा !
When to The Lord I was denounced for crying Doomsday
Too soon, by that Archangel who must blow Its trumpet
*

निदा आई क: आशोब-ए-क़यामत से यह क्या कम है
*गरफ़ता चीनियाँ अहराम-ओ-मक्की ख़ुफ़्ता दर बतहा !
God made answer—Is Doomsday far
When Makkah sleeps while China worships?
*

लबालब शीशा-ए-तहज़ीब हाज़िर है मय-ए-"ला" से
मगर साक़ी के हाथों में नहीं पैमाना-ए-"इल्ला" !
Though the bowl of faith finds none to pour, the beaker
Of modern thought brims with the wine of No.
*

दबा रक्खा है उस को ज़ख्मावर की तेज़ दस्ती ने
बहुत नीचे सुरों में है अभी योरप का वावैला !
Subdued by the dexterous fiddler’s chords there murmurs
In the lowest string the wail of Europe’s woe.
*

इसी दरया से उठती है वो मौज-ए-तुन्द जौलाँ भी
नहनगों के नशेमन जिस से होते हैं तहो बाला !
Her waters that have bred the shark now breed
The storm‐wave that will smash its den below!

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ग़ुलामी क्या है? ज़ौक़-ए-हुस्न-ओ-ज़ेबाई से महरूमी
जिसे ज़ेबा कहें आज़ाद बन्दे, है वही ज़ेबा
Slavery—exile from the love of beauty:
Beauty—whatever free men reckon so;
*

भरोसा कर नहीं सकते गुलामों की बसीरत पर
क: दुनिया में फ़क़त मरदान-ए-हुर की आँख है बीना
Trust no slave’s eyes, clear sight and liberty
Go hand in hand. His own resolves bestow
*

वही है साहिब-ए-अमरोज़ जिसने अपनी हिम्मत से
ज़माने के समन्दर से निकाला गौहर-ए-फ़र्दा
The empire of To‐day on him who fishes
To‐morrow’s pearl up from Time’s undertow.
*

फ़रंगी शीशागर के फ़न से पत्थर हो गए पानी
मेरी इकसीर ने शीशे को बख्शी सख्ती-ए-ख़ारा
The Frankish glassblowers’ arts can make stone run:
My alchemy makes glass flint‐hard.
*

रहे हैं, और हैं फ़िरओन मेरी घात में अब तक
मगर क्या ग़म क: मेरी आस्तीं में है यद-ए-बैज़ा
Pharaoh plotted and plots against me; but what harm?
Heaven lifts my hand, like Moses’, white as snow;
*

वो चिंगारी ख़स-ओ-ख़ाशाक से किस तरह दब जाए
जिसे हक़ ने किया हो नीस्ताँ के वास्ते पैदा
Earth’s rubbish‐heaps can never quell this spark
God struck to light whole deserts, His flambeau!
*

मुहब्बत ख़वेश्तन-बीनी, मुहब्बत ख़वेश्तन-दारी
मुहब्बत आस्तान-ए-क़ैसर-ओ-किसरा से बे-परवा
Love, self‐beholding, self‐sustaining, stands
Un‐awed at the gates of Caesar or Khosro;
*

अजब क्या गर मह-ओ-परवीं मेरे नख़चीर हो जाएँ
क: बर फ़त्राक-ए-साहिब दौलते बिस्तम सर-ए-ख़ुद रा
If moon or Pleiades fall my prey, what wonder—
Myself bound fast to the Prophet’s saddle‐bow!
*

वो दाना-ए-सुबुल, ख़त्मुर्रुसुल, मौला-ए-कुल जिसने
ग़ुबार-ए-राह को बख्शा फ़रोग़-ए-वादी-ए-सीना
He—Guide, Last Envoy, Lord of All—
Lent brightness of Sinai to our dust;
*

 निगाह-ए-इश्क़-ओ-मस्ती में वही अव्वल, वही आख़िर
वही क़ुरआँ, वही फ़ुरकाँ, वही यासीं, वही ताहा
Love’s eyes, not slow to kindle, hail him Alpha and Omega,
Chapter, and Word, and Book. I would not go
*

सनाई के अदब से मैंने ग़व्वासी न की वरना
अभी इस बहर में बाक़ी हैं लाखों लूलू-ए-लाला
Sanayi Ke Adab Se Mein Ne Gawwasi Na Ki Warna
Abhi Iss Behar Mein Baqi Hain Lakhon Lulu’ay Lala
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English Translation: Iqbal Urdu Blog